अटल जी ने कहा था, हम सत्ता का चरित्र बदलने की कोशिश करेंगे, न बदल सके तो खुद पर हंसेंगे!
भारत की सियासी जमीन पर जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी को उकेरने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने एक सभा में सत्ता के चरित्र पर राय रखी और वहीं अपनी पार्टी की कोशिश पर भी। उनका वो वीडियो आजकल बड़ी तेजी से वॉयरल हो रहा है …..सत्ता का चरित्र एक सा होता है( आप भी सुनिए वीडियो
देश के मौजूदा हालात को देखते हुए और अटल जी की इस बात को सुनते हुए तमाम सवाल उठ रहे हैं.. अटल जी ने घोषित आपातकाल देखा..और आज की नई पीढ़ी इस दौर को देख रही है…जहां संविधान के आर्टिकल 19 की पैरवी के लिए जंग लड़ी जा रही है..
आज लोकतंत्र में जनता मुद्दों के लेकर सड़क पर है । देश हो या प्रदेश हर जगह विपक्ष जनता के सवालो को लेकर मुखर है.। .उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड में संदिग्ध वीआईपी को लेकर सवाल उठ रहा है..सीबीआई की जांच सुस्त क्यों है ? इस पर तेवर दिख रहे हैं..पीड़ित परिवार पूछ रहा है कि जो संदिग्ध है, उसे जांच के दायरे से बाहर करने के लिए ,खास क्यों बनाया जा रहा है ..
उधर दिल्ली की सड़क पर वोट के अधिकार की हिफाजत पर सैलाब उमड़ा हुआ है। जनता को शक है कि वोट के अधिकार के साथ गड़बड़ी हो रही है। राष्ट्रीय ध्वज जिसे अमृतकाल मे हर घर तिरंगा फहराने की गुजरिश की गई थी, उसी अमृतकाल में उसे न तो सड़क पर फहराने की इजाजत है और न तय धरना प्रदर्शन स्थल पर फहराने की इजाजत। हद तो ये है कि धरना स्थल तक बदलने का ऐलान हो गया है।
नए दौर के लीडर सरकार पर लांछन लगा रहे है कि आज अघोषित इमरजेंसी है। ऐसे में अटल जी की बात याद आ रही है सत्ता का चरित्र एक सा होता है हम बदलने की कशिश करेंगे ….पर यहां तक आते-आते .सरकारें तो बदली चेहरे भी बदले लेकिन चरित्र नहीं बदला…वो अधिकार और सवाल के नाम पर क्रूर होता चला गया।
जनता को वो दिन भी याद आ रहा है जब उनसे वादा किया गया था अच्छे दिन आएंगे और आज की तस्वीर भी दिखाई दे रही है, जब आवाज उठाने की कीमत न्यायिक हिरासत है। जिस पार्टी के संस्थापक ने कहा था कि हम सत्ता का चरित्र बदलने की कोशिश कर रहे हैं । अगर हमारी कोशिश कामयाब न हुई तो हम खुद पर हंसने का अवसर नहीं छोड़ेगे। हम खुद पर हंसेगें ताकि आए हुए संकट में मजबूत हो सके ।
आज अटल जी की पार्टी के रसूखदार उस चरित्र के खांचे में बैठ गए जिसकी कभी अटल जी ने मुखालफत की थी..आलम ये है कि आज हसंना तो छोड़िए अगर किसी ने हंसने या हंसाने की कोशिश की तो उसे दुस्साहस माना जा रहा है। उससे माफी मंगवाई जाती है.. सत्ता अभिव्यक्ति की आजादी को अराजकता करार दे रही है ..
अभिव्यक्त करने वाले को जोर जबरन डिटेन किया जा रहा है । हास्य की गुजाइंश नहीं, विचार पर बंदिश.है। जिस फोर्स को दुश्मन से निपटना था वो अपनी जनता की आवाज को वर्दी के गमबूटों तले कुचल रही है। अटल जी ने कहा था,हम सत्ता चरित्र बदलने की कोशिश कर रहे हैं ,लेकिन यहां तक आते आते उनके शागिर्दों ने, कोशिश तो छोडिए पहल तक नहीं की।
.वो काम हो रहे हैं जिनके खिलाफ अवाम के दिलों में गुस्सा भर रहा है। चाहे किसी को संवैधानिक पद पर बिठाने की कवायद हो या दिए पद पर बिठाए रखने के लिए साख दाव पर लगाने की नौबत। सत्ता के गलियारे में.गुस्सा तारी है, हंसी गायब है, और अटल जी की बात नदारद ।

