उत्तराखंड में भीषण गर्मी और हीटवेव के प्रकोप को देखते हुए मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने राज्य के सभी स्कूलों में नियमित अंतराल पर ‘पानी की घंटी’ बजाने के निर्देश दिए थे। इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि छात्र-छात्राएं समय-समय पर पानी पीकर खुद को हाइड्रेटेड रख सकें। हालांकि, प्रशासन की यह महत्वपूर्ण योजना फिलहाल कागजों तक ही सीमित नजर आ रही है। जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के अधिकांश स्कूलों में अभी तक न तो यह घंटी बजी है और न ही शिक्षकों तक इस संबंध में कोई आधिकारिक आदेश पहुंचा है, जिससे चिलचिलाती धूप में बच्चों की सेहत पर खतरा बना हुआ है।
क्या था मुख्य सचिव का निर्देश?
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने एक उच्च स्तरीय बैठक में शिक्षा विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि स्कूलों में वॉटर बेल की व्यवस्था लागू की जाए। अन्य राज्यों की तर्ज पर शुरू की गई इस योजना के तहत, स्कूल के दौरान एक विशेष घंटी बजानी थी, जिसका अर्थ यह होता कि अब सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से पानी पीना है। मुख्य सचिव ने कहा है कि अब उन अफसरों से जवाब मांगा जाएगा जिनकी लापरवाही के कारण यह आदेश स्कूलों तक नहीं पहुंच सका है।
शिक्षकों और स्कूलों की दलील
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, स्कूलों में अभी भी पुराने ढर्रे पर ही काम चल रहा है, जहाँ बच्चों को पानी पीने के लिए शिक्षक से अनुमति लेनी पड़ती है। कई शिक्षकों और जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष विनोद थापा का कहना है कि उन्हें इस आदेश की जानकारी केवल सोशल मीडिया या मोबाइल के माध्यम से मिली है। विभाग की ओर से कोई विधिवत लिखित आदेश न मिलने के कारण स्कूलों में इसे अभी तक लागू नहीं किया जा सका है।
हीटवेव का बढ़ता खतरा और लापरवाही
प्रदेश में लगातार तापमान बढ़ रहा है, जिससे बच्चों में डिहाइड्रेशन और लू लगने का डर बना हुआ है। ‘वॉटर बेल’ जैसी व्यवस्था बच्चों को गर्मी से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकती थी, लेकिन शिक्षा विभाग की सुस्ती ने इस संवेदनशील आदेश को बेअसर कर दिया है। फिलहाल छात्र प्यास लगने पर ही पानी पी रहे हैं, जबकि सरकारी मंशा उन्हें नियमित अंतराल पर पानी पीने के लिए प्रोत्साहित करने की थी।

