देहरादून। दिल्ली में चल रहे CJP आंदोलन के दौरान उस समय अचानक हड़कंप मच गया, जब उत्तराखंड पुलिस का निलंबित सिपाही शेर सिंह मंच पर पहुँच गया। कैमरों के सामने आकर उसने अचानक अपना इस्तीफा लहराना शुरू कर दिया। आंदोलन के मंच पर हुए इस ड्रामे के बाद प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर आंदोलन की साख पर पड़ा है।
शेर सिंह के इस कदम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जो व्यक्ति पिछले एक साल से अधिक समय से विभागीय निलंबन झेल रहा है, वह आखिर किस पद से इस्तीफा दे रहा है। बिना किसी बहाली आदेश के सार्वजनिक मंच से त्यागपत्र लहराने की इस हरकत को लोग महज सुर्खियां बटोरने का जरिया मान रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि सिपाही शेर सिंह वर्ष 2025 से हरिद्वार जिले में दर्ज एक गंभीर आपराधिक मुकदमे के कारण पुलिस सेवा से निलंबित चल रहा है। उस पर गरीबों की जमीनों पर अवैध कब्जा कराने, आम लोगों को डराने-धमकाने और एक गिरोह चलाकर अपना प्रभाव स्थापित करने जैसे संगीन आरोप लगे थे।
जमीन हड़पने और आपराधिक गतिविधियों के इसी मामले में आरोपी सिपाही को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। आपराधिक मामले में नाम सामने आने और जेल जाने के बाद पुलिस विभाग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था। तब से वह पुलिस की सक्रिय सेवा से बाहर है।
निलंबन की इस अवधि के दौरान समय-समय पर उसके कुछ राजनीतिक संगठनों से जुड़े होने और उनके कार्यक्रमों में दिखाई देने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। हालांकि, इन दावों की किसी भी प्रशासनिक स्तर पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
ऐसे में छात्र आंदोलन के मंच का फायदा उठाकर अचानक “इस्तीफा” देने का ऐलान करने पर विशेषज्ञ भी हैरान हैं। जानकारों का कहना है कि जब वह पहले से निलंबित है और सेवा में तैनात ही नहीं है, तो सार्वजनिक रूप से दिए गए इस इस्तीफे का कोई कानूनी या विभागीय महत्त्व नहीं रह जाता।
फिलहाल उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक यह घटनाक्रम चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन के मंच से किया गया यह प्रदर्शन वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने और मीडिया की हेडलाइंस हासिल करने की एक सोची-समझी कोशिश लग रही है।

