नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में मदरसों और अल्पसंख्यक स्कूलों से जुड़े ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम’ के नए संशोधित मानकों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई के लिए 15 सितंबर की तिथि तय की है।
यह याचिकाएं अली एजुकेशन वेलफेयर एसोसिएशन हेड एंग्लो इंडियन, केबीएन एजुकेशन और कई मदरसा प्रबंधनों द्वारा संयुक्त रूप से दायर की गई हैं। याचिकाओं में राज्य सरकार द्वारा जून 2026 में लागू की गई नई नियमावली और कठोर शर्तों की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं।
अदालत में मदरसा प्रबंधनों ने पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी संस्थाएं वर्ष 2006 से पंजीकृत हैं और नियमपूर्वक संचालित हो रही हैं। इन संस्थानों में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है और ये राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सरकार द्वारा जून 2026 में संशोधित किए गए नए मानकों को इतने कम समय में पूरा करना असंभव है। यदि ये शर्तें जबरन थोपी गईं, तो आगामी शैक्षणिक सत्र में राज्य के अधिकांश अल्पसंख्यक संस्थान और मदरसे बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।
याचिका में आशंका जताई गई है कि इन संस्थानों के बंद होने से इनमें पढ़ रहे हजारों छात्र-छात्राओं की पढ़ाई बीच में ही छूट जाएगी, जिससे उनके भविष्य और करियर पर सीधा बुरा असर पड़ेगा।
अदालत के समक्ष भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 का हवाला भी दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि संविधान धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का मौलिक अधिकार देता है, जिसका नए नियमों से हनन हो रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट को यह भी बताया कि नई नियमावली में बेहद सख्त दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए हैं। तय प्रक्रिया का पालन न करने पर 5 लाख रुपये तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाने और संस्थान को तुरंत बंद करने का नियम बनाया गया है, जिस पर अदालत 15 सितंबर को पुनः सुनवाई करेगी।

