देहरादून। उत्तराखंड में वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण अभियान के ताजा सरकारी आंकड़ों ने पहाड़ से हो रहे बेकाबू पलायन की एक बेहद डरावनी और कड़वी सच्चाई को उजागर किया है। मुख्य निर्वाचन कार्यालय के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के नौ पर्वतीय जिलों में इस बार मतदाताओं की संख्या में 2.61 लाख से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस चौंकाने वाले खुलासे का सीधा असर उत्तराखंड की पर्वतीय राजनीति, भविष्य में होने वाले विधानसभा परिसीमन और सबसे बढ़कर देश की सामरिक सुरक्षा पर पड़ने जा रहा है।
वोटर लिस्ट के इस नए संशोधन ने सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील सीमांत क्षेत्रों में बड़ी चिंताएं खड़ी कर दी हैं। चीन और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों की 12 सीमांत विधानसभा सीटों से ही अकेले 86 हजार 994 मतदाता गायब हो चुके हैं। सरहदों के पास से इतनी बड़ी आबादी का कम होना राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और सरकार के लिए एक बहुत बड़ा नीतिगत संकट बन चुका है।
हालांकि, तकनीकी छंटनी के चलते मैदानी जिलों में भी मतदाताओं के नाम कटे हैं, लेकिन पर्वतीय जिलों के मुकाबले वहां की जनसांख्यिकी में कोई कमी नहीं आई है। देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में पिछले कुछ सालों में भारी जनघनत्व बढ़ा है। इन मैदानी इलाकों में न केवल पर्वतीय क्षेत्रों के लोग आकर बस रहे हैं, बल्कि देश के दूसरे राज्यों के लोगों ने भी इन्हें अपना आशियाना बना लिया है।
इसके उलट, पहाड़ के दुर्गम पर्वतीय जिले लगातार इंसानों से खाली हो रहे हैं। आंकड़ों की मानें तो उत्तराखंड के लगभग 700 से ज्यादा गांव पलायन की इस बेकाबू मार के चलते पूरी तरह से ‘घोस्ट विलेज’ यानी भूतिया गांवों में तब्दील हो चुके हैं, जहां अब सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने या वोट देने वाला कोई भी स्थायी निवासी नहीं बचा है।
रिवर्स पलायन का कड़वा सच: लौटने वाले उंगलियों पर गिनने लायक
पहाड़ से पलायन जितनी रफ्तार से हो रहा है, उसके मुकाबले ‘रिवर्स पलायन’ यानी घर वापसी की रफ्तार बेहद सुस्त है। पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2025 तक केवल 6,282 लोग ही देश के दूसरे राज्यों से वापस अपने मूल गांवों में लौटे हैं। जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, पौड़ी जिले में सबसे अधिक 1,213 प्रवासियों ने अपने घर वापसी की है, जिसके बाद अल्मोड़ा में 976, टिहरी में 827, चमोली में 760 और उत्तरकाशी में 448 लोगों का रिवर्स पलायन दर्ज किया गया।
वहीं, अन्य पर्वतीय जिलों में बागेश्वर में 368, पिथौरागढ़ में 344, रुद्रप्रयाग में 342, चंपावत में 324 और नैनीताल में केवल 300 लोग वापस लौटे हैं, जबकि मैदानी जिलों की स्थिति सबसे अधिक निराशाजनक रही है जहां देहरादून में 201, हरिद्वार में 141 और उधमसिंह नगर में सबसे कम महज 38 लोगों ने ही अपने मूल गांवों का रुख किया है।
देहरादून की बादशाहत खत्म, हरिद्वार नंबर वन
इस बड़े संशोधन के बाद राज्य में सर्वाधिक मतदाताओं वाले जिलों की रैंकिंग भी पूरी तरह से बदल गई है। एसएसआईआर की इस बड़ी छंटनी के बाद जिलों की रैंकिंग में अब हरिद्वार जिला 12,46,219 मतदाताओं के साथ राज्य में पहले स्थान पर काबिज हो गया है, जबकि पहले नंबर वन पर रहने वाला देहरादून जिला अब 11,90,805 मतदाताओं के साथ खिसककर दूसरे स्थान पर आ गया है (जिससे हरिद्वार के मुकाबले देहरादून में करीब 55 हजार वोटर कम हो गए हैं) और उधमसिंह नगर 11,55,672 मतदाताओं के साथ राज्य में तीसरे पायदान पर बना हुआ है।
सीमांत विधानसभा क्षेत्रों में घटे मतदाता
सीमांत जिलों की विभिन्न सीटों पर घटे मतदाताओं के ब्योरे को देखें तो उत्तरकाशी के गंगोत्री विधानसभा क्षेत्र से 7,850, पुरोला से 5,309 और यमुनोत्री से 5,245 वोटर घटे हैं, जबकि चमोली जिले की बद्रीनाथ सीट से 8,310, कर्णप्रयाग से 8,309 और थराली विधानसभा से 6,817 मतदाताओं के नाम कम हुए हैं; इसी तरह पिथौरागढ़ जिले की मुख्य सीट से रिकॉर्ड 11,850, गंगोलीहाट से 7,063, धारचूला से 5,190 और डीडीहाट से 3,333 वोटर्स की कटौती दर्ज की गई है, तो वहीं चंपावत जिले के लोहाघाट विधानसभा क्षेत्र से सबसे अधिक 12,425 और चंपावत सीट से 5,293 मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से पूरी तरह साफ हो गए हैं।

