देहरादून। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के उपनल संविदा कर्मचारियों और रोडवेज कर्मियों से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मामलों में कड़ा रुख अपनाया है। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इन दोनों महत्वपूर्ण मामलों में राज्य सरकार और रोडवेज प्रबंधन को अपना पक्ष रखने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में सरकार की ओर से पैरवी करने के लिए देश के जाने-माने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता तुषार मेहता खुद नैनीताल पहुंचे, जिसके बाद कोर्ट के इस रुख पर पूरे प्रदेश की नजरें टिक गई हैं।
उपनल कर्मियों की अवमानना याचिका पर सुनवाई
उपनल संविदा कर्मचारियों को हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के बावजूद नियमित न किए जाने, चयनित वेतनमान का लाभ न देने और उनके वेतन से जीएसटी की कटौती करने के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ में सुनवाई हुई।
इस दौरान सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि वे इस मामले में पहली बार पैरवी के लिए आए हैं। उन्होंने फाइलों और कानूनी दस्तावेजों का गहराई से अध्ययन करने के लिए समय मांगा। एकल पीठ ने उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद होगी।
रोडवेज कर्मियों के वेतन से ₹6.50 करोड़ की कटौती
दूसरी ओर, मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष रोडवेज कर्मचारियों के वेतन से की जा रही अवैध कटौती को लेकर सुनवाई हुई। रोडवेज कर्मचारी यूनियन और संयुक्त परिषद ने आरोप लगाया कि प्रबंधन कर्मचारियों के वेतन से काटा जा रहा अंशदान को-ऑपरेटिव सोसाइटी में जमा नहीं कर रहा है।
अदालत ने माना कि रोडवेज प्रबंधन द्वारा कर्मचारियों के वेतन से लगभग 6.50 करोड़ रुपये काटकर सोसाइटी में जमा न करना एक बेहद गंभीर मामला है। इस वित्तीय अनियमितता का संज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने रोडवेज प्रबंधन और सरकार को तीन हफ्ते के भीतर विस्तृत जवाब पेश करने के आदेश दिए हैं।
दूरस्थ क्षेत्रों में बुजुर्गों की सुरक्षा और मिड-डे मील पर सवाल
इसी दौरान, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में बुजुर्गों की बदहाली और सुरक्षा को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर भी सुनवाई की। याचिकाकर्ता की अधिवक्ता दीपा आर्या ने अदालत को बताया कि उत्तराखंड के पर्वतीय और सीमांत क्षेत्रों में बुजुर्गों को बुनियादी स्वास्थ्य व सुरक्षा सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
इसके साथ ही उन्होंने कोर्ट के सामने यह गंभीर मुद्दा भी उठाया कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को तय मानकों के तहत मिड-डे मील तक नहीं दिया जा रहा है। हाईकोर्ट ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए उत्तराखंड सरकार को आगामी चार सप्ताह के भीतर पूरे मामले पर विस्तृत जवाब दाखिल करने का कड़ा निर्देश जारी किया है।

