Uttarakhand: सिर्फ गंध आने पर नहीं दर्ज होगा ड्रिंक एंड ड्राइव का केस, साइंटिफिक टेस्ट जरूरी

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देहरादून। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नशे में गाड़ी चलाने के मामलों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने दोटूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति पर नशे में वाहन चलाने का आरोप सिद्ध करने के लिए केवल मुंह से शराब की गंध आना काफी नहीं है। इसके लिए ब्लड टेस्ट या ब्रेथ एनालाइजर जैसी वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट का होना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

माननीय न्यायालय की एकल पीठ के इस ऐतिहासिक फैसले से उन हजारों वाहन चालकों को बड़ी राहत मिलने वाली है, जिन पर पुलिस केवल गंध के आधार पर मनमाने ढंग से केस दर्ज कर देती है। जस्टिस आलोक कुमार वर्मा की एकल पीठ ने यह दूरगामी फैसला एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई के दौरान सुनाया।

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क्या था पूरा मामला और कोर्ट का रुख?

यह पूरा मामला याचिकाकर्ता अमर सिंह से जुड़ा है, जिस पर नशे की हालत में जीप चलाते हुए सड़क दुर्घटना करने का आरोप था। इस हादसे में एक यात्री की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे। हादसे के घटनाक्रम के अनुसार याचिकाकर्ता बद्रीनाथ धाम से चमोली की तरफ अपनी जीप लेकर जा रहा था, तभी अचानक वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया; हालांकि हादसे के बाद हुए चिकित्सकीय परीक्षण में डॉक्टरों ने वैज्ञानिक सबूतों के अभाव के बीच रिपोर्ट में केवल ‘मुंह से शराब की गंध आने’ की बात लिखी थी, जबकि इस पूरे केस में न तो आरोपी का कोई ब्लड सैंपल लिया गया और न ही मौके पर ब्रेथ एनालाइजर से उसके शरीर में अल्कोहल की सटीक मात्रा की जांच की गई थी।

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कानून क्या कहता है?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने मोटर वाहन अधिनियम 1988 का हवाला देते हुए एक बेहद मजबूत दलील पेश की। कानून के मुताबिक, किसी भी चालक को नशे की हालत में गाड़ी चलाने का आरोपी तभी ठहराया जा सकता है जब वैज्ञानिक जांच में उसके खून में शराब की मात्रा तय कानूनी सीमा से अधिक पाई जाए।

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याचिकाकर्ता ने कोर्ट में यह तकनीकी पक्ष भी रखा कि दुर्घटना शराब के कारण नहीं, बल्कि पहाड़ी रास्ते पर अचानक जीप का अगला बायां टायर फट जाने की वजह से हुई थी।

जस्टिस आलोक कुमार वर्मा की एकल पीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद यह माना कि वैज्ञानिक प्रमाणों के बिना केवल डॉक्टर की पर्ची पर ‘गंध’ लिख देने से दोष साबित नहीं होता। कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस और अभियोजन पक्ष को अदालती कार्यवाही में आरोपी के खिलाफ वैज्ञानिक साक्ष्य पेश करने ही होंगे, अन्यथा आरोपी को संदेह का सीधा लाभ मिलेगा।

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