उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: स्पाइनल इंजरी के पीड़ितों को भर्तियों में मिलेगा आरक्षण

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नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बिना न्यूरोलॉजिकल कंडीशन वाली स्पाइनल डिफॉर्मिटी और स्पाइनल इंजरी को लोकोमोटर दिव्यांगता की उप-श्रेणी में शामिल करते हुए राज्य की भर्तियों में क्षैतिज आरक्षण, देने के सख्त निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने मनोज सिंह कंडारी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बड़ा फैसला सुनाया है।

याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए बताया कि केंद्र सरकार ने 24 अगस्त 2022 को जारी अधिसूचना के जरिए स्पाइनल डिफॉर्मिटी और स्पाइनल इंजरी को लोकोमोटर दिव्यांगता की नई उप-श्रेणी के तौर पर शामिल किया था। इस व्यवस्था को उत्तराखंड शासन ने भी 11 फरवरी 2026 के अपने शासनादेश के माध्यम से विधिवत मान्यता दी थी।

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इसके बावजूद, उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा 31 अगस्त 2026 को जारी ग्रुप-सी भर्ती के विज्ञापन में इस नई श्रेणी के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई थी। इस लापरवाही पर कड़ा संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित विभागों को 15 दिनों के भीतर पदों की पहचान और आवश्यक संशोधन प्रक्रिया पूरी कर संशोधित अधियाचन आयोग को भेजने के आदेश जारी किए हैं।

अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि जब तक यह पूरी संशोधन प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक चयन आयोग 31 अगस्त के जारी भर्ती विज्ञापन पर आगे की कोई कार्रवाई या प्रक्रिया संचालित नहीं करेगा। विभागों से संशोधित मांग पत्र मिलने के बाद ही आयोग शुद्धिपत्र जारी करेगा और नई दिव्यांग श्रेणी को आरक्षण में शामिल करेगा।

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इसके अलावा, हाईकोर्ट की एक अन्य एकलपीठ ने आरक्षित वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान मारपीट और जानलेवा हमले के आरोपी सरकारी कर्मचारियों को कानूनी संरक्षण दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की एकलपीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत अधिकारियों-कर्मचारियों को संरक्षण प्रदान करते हुए इस संबंध में दायर याचिका को खारिज कर दिया है।

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मामले में याचिकाकर्ता मोहम्मद अरशद अय्यूब ने आरोप लगाया था कि 16 जनवरी 2017 को अतिक्रमण हटाने के दौरान सरकारी टीम ने मारपीट कर लाठी से हमला किया, जिससे उसका पैर टूट गया था। नैनीताल की निचली अदालत ने पहले समन जारी किए थे, जिसे बाद में सत्र न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देते हुए साफ किया कि आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के दौरान हुई घटना के आधार पर कर्मचारियों का कानूनी संरक्षण खत्म नहीं किया जा सकता।