देहरादून। उत्तराखंड के विभिन्न सरकारी विभागों और विकास प्राधिकरणों में जनता के पैसों के हिसाब-किताब को लेकर भारी लापरवाही उजागर हुई है। पिछले पांच वित्तीय वर्षो में जारी की गई 1965.27 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र महालेखाकार कार्यालय को नहीं सौंपा गया है। बार-बार पत्र भेजने के बावजूद विभागों के ढुलमुल रवैये से प्रशासनिक गलियारों में गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी अनुदान को जारी किए जाने के ठीक एक साल के भीतर उसका उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। हालांकि, उत्तराखंड के कई विभाग सालों से इस जरूरी लेखा-जोखा को दबाकर बैठे हैं। इस मनमानी से न केवल सरकारी खजाने की पारदर्शिता खत्म हो रही है, बल्कि विकास योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी संशय बन गया है।
इस वित्तीय लापरवाही का कड़ा संज्ञान लेते हुए महालेखाकार ने राज्य के वित्त सचिव को सीधा पत्र लिखकर अपनी गहरी नाराजगी जताई है। महालेखाकार ने इसे स्पष्ट रूप से वित्तीय अनियमितता करार दिया है, जिसके बाद से शासन स्तर पर अफरा-तफरी का माहौल है।
मामला तूल पकड़ते ही शासन ने सख्त रुख अपनाया है। उत्तराखंड आवास एवं नगर विकास प्राधिकरण, उत्तराखंड आवास एवं विकास परिषद् और उत्तराखंड मेट्रो रेल कॉरपोरेशन समेत सभी क्षेत्रीय विकास प्राधिकरणों को तत्काल नोटिस जारी किए गए हैं। इन सभी संस्थाओं को खर्च हुए सरकारी बजट का पूरा ब्योरा अविलंब सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
इस संबंध में अपर सचिव वित्त ने भी सभी संबंधित विभागाध्यक्षों को पत्र जारी कर त्वरित कार्रवाई करने का कड़ा आदेश दिया है। शासन का प्रयास है कि वित्तीय गड़बड़ियों की गुंजाइश को खत्म करने के लिए जल्द से जल्द सभी खातों का मिलान पूरा किया जाए।
वित्तीय विशेषज्ञों की मानें तो जब तक जारी किए गए बजट का स्पष्ट हिसाब नहीं मिलता, तब तक पैसों के सही इस्तेमाल या किसी बड़े घालमेल की पुष्टि होना असंभव है। इस तरह की लापरवाही से राज्य के वास्तविक खर्चों का सही आकलन करने में ऑडिट टीमों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र न भेजे जाने का सबसे बड़ा नुकसान राज्य के विकास कार्यों पर पड़ सकता है। यूसी न मिलने की दशा में केंद्र या राज्य सरकार से मिलने वाली अगली किस्तों का बजट रोका जा सकता है, जिससे कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं बीच में ही अटक सकती हैं।

