“धामी” को हल्के में लेने की गलती न करें साहब! 2022 में भी समीकरण हुए थे फेल…..

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देहरादून। चुनाव नजदीक आते ही सियासत की बिसात पर मोहरे सजने लगते हैं, लेकिन उत्तराखंड में लगता है कि चुनावी हवा का असर सरकारी दफ्तरों तक भी पहुंचने लगा है। चर्चाएं हैं कि कुछ अधिकारी सरकारी कामकाज से ज्यादा आने वाले राजनीतिक समीकरणों को पढ़ने में दिलचस्पी लेने लगे हैं। कोई चेहरे बदलने की चर्चा कर रहा है तो कोई व्यवस्था में बदलाव के कयास लगा रहा है।

यानी सरकार का काम अपनी जगह और चुनावी गणित अपनी जगह लेकिन कुछ अफसरों के लिए दोनों के बीच की दूरी शायद कम होती जा रही है। दिलचस्प यह है कि जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने, जनता से जुड़े कामों को गति देने और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत रखने की है, उनके बीच चुनावी जोड़-तोड़ को लेकर चर्चाएं तेज होने की बात सामने आ रही है। मानो सरकारी फाइलों से ज्यादा दिलचस्पी अब राजनीतिक फाइलों में पैदा हो गई हो।

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हालांकि चुनावी भविष्यवाणी करना अधिकारियों का काम नहीं है, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। कुछ लोग अपने-अपने हिसाब से समीकरण बैठा रहे हैं। कोई सत्ता में संभावित बदलाव का हिसाब लगा रहा है तो कोई चेहरे को लेकर अटकलें लगा रहा है। सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों को भी चुनावी भविष्यवाणी के इस खेल में उतरना चाहिए?

खासकर तब, जब उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का राजनीतिक सफर खुद कई धारणाओं को गलत साबित कर चुका है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्ता में लौटने के बावजूद धामी स्वयं अपनी विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे। उसके बावजूद भी पार्टी नेतृत्व ने उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री की कमान सौंपी। बाद के वर्षों में भी पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा कायम रखा और संगठनात्मक स्तर पर उनका कद लगातार मजबूत दिखाई दिया।

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यानी 2022 का चुनावी गणित जिन लोगों ने अपनी सुविधा के हिसाब से पढ़ा था, उन्हें शायद यह उदाहरण याद रखना चाहिए कि राजनीति में अंतिम फैसला चुनावी अटकलों से नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व और संगठन की रणनीति से होता है। भाजपा की चुनावी रणनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि पार्टी सिर्फ चेहरा देखकर चुनाव नहीं लड़ती। बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और जमीन पर नेटवर्क तैयार करना उसकी पुरानी रणनीति का हिस्सा रहा है।

ऐसे में कुछ अधिकारियों का अपने-अपने हिसाब से चुनावी समीकरण तैयार करना शायद जल्दबाजी ही कहा जाएगा।
सियासत में सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि जो आज तय दिखाई दे रहा है, वह कल भी वैसा ही रहेगा। राजनीति में कब कौन सा समीकरण पलट जाए, इसका हिसाब बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित भी नहीं लगा पाते। ऐसे में अगर अधिकारी ही चुनावी नतीजों और संभावित बदलावों के हिसाब से अपनी सुविधा तलाशने लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी कामकाज आखिर प्राथमिकता में कहां है?

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सूत्रों के मुताबिक, ऐसे अधिकारियों की गतिविधियों और चुनावी चर्चाओं में उनकी कथित दिलचस्पी को लेकर नजर रखे जाने की भी चर्चा है। हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन अगर यह बात सही है तो उन अधिकारियों के लिए संकेत साफ है चुनाव का गणित लगाना राजनीतिक दलों का काम है, प्रशासन का नहीं। क्योंकि चुनाव आएंगे, जाएंगे, सरकारें बनेंगी और बदलेंगी भी, लेकिन सरकारी व्यवस्था में बैठे अधिकारियों से उम्मीद हमेशा एक ही रहेगी कुर्सी किसकी होगी, इसका हिसाब लगाने से पहले अपनी कुर्सी की जिम्मेदारी निभाइए।