…तो गांव के हिस्से की बिजली से ठंडे रखोगे शहर !

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अब देहरादून वो दून नहीं रहा जो कभी रिटायर्ड आर्मी अफसर ओएनजीसी और दूसरे तमाम अफसर और सरकारी मुलाजिमों की पसंद हुआ करता था। तब दून में बेशुमार आम-लीची के बाग हुआ करते थे और मीलो मील फैली बासमती के खेत। वक्त बदला और दून भी बदल गया खेत और बागों में कंकरीट की फसल उगने लगी है। अब दून में तांगा नहीं चलता, बाजार की सड़के धुंए वाले वाहनो से पट गए हैं। जाहिर सी बात है देहरादून की आबादी बेहिसाब बढ़ गई है। लिहाजा दून की जरूरते भी बढ़ गई हैं बिजली हो या पानी हर एक की खपत में इजाफा हुआ है।

जिसकी पूर्ति करने के लिए शासन प्रशासन को ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है। खास कर गर्मियो में तो हाल बेहाल हो जाते हैं न पूरी बिजली मिलती है न पूरा पानी। कोई न कोई मुहल्ला पानी के लिए तड़फता रहता है। बिजली के तो हाल और भी बुरे हो जाते हैं। शहर में बिजली की खपत पूरी करने के लिए शहर से सटे देहरादून के गांवों को खामियाजा भुगतना पड़ता है। शहर में मिनटों की बिजली कटौती होती है जबकि गांवों में जनता को घंटो तक बिजली से महरूम कर दिया जाता है।

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उत्तराखंड पॉवर कॉरपोरेशन जिसके कांधे पर बिजली का इंतजाम है खपत पूरी करने में उसके ही पसीने छूट रहे हैं। आलम ये है कि पूरे राज्य में 2.4 करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन हो रहा है जबकि खपत तकरीबन साढे चार करोड़ यूनिट से ज्यादा है। ऐसे में भरपूर बिजली की तो बात छोड़िए जरूरत भर की बिजली के इंतजाम करने में यूपीसीएल खुद पसीने से भीगने लगा है।

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बहरहाल असल सवाल ये है कि क्या गांव में इंसान नहीं रहते जो शहर वालों की जरूरत पूरी करने के लिए गांव वालों का पसीना निचोड़ लिया जाता है। हुजूर गरमियां सबके लिए हैं चाहे शहर वाले हों या गांव वाले आपको न्याय करना चाहिए न कि भेदभाव। माना कि गांव में पेड़ हैं और उसकी वजह से कुछ हद तक टैंपरेचर कम रहता है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि शहर के गुनाहो की सजा गांव को दे दो। किसने कहा था कि, खेत में पेड़ के बजाय फ्लैट उगाओ और विकास की सलीब पर गांव को टांग दो।

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उम्मीद है कि अच्छा होगा लेकिन विश्वास नहीं होता कि सिस्टम सुधर पाएगा। गांव के लिए रहमदिल बनेगा। बेहतर रहेगा कि शहर को भी पेड़ों की छाव दी जाए ताकि गर्मी का चाबुक शहर की देह पर न पड़े ..माना कि बड़ा वक्त हाथ से फिसल गया है ,लेकिन इतना भी नहीं फिसला है कि शहर की सूरत संवर न सके। बस जरूरत है ईमानदार कोशिश की और हर शहरवासी को भागीदार बनाने की उसे रहमदिल बनाने की ताकि शहर को भी दरख्तों की दुआए मिल सकें।

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