सरकारी विभागों में टेंडर के नाम पर खेल होने की चर्चाएं कोई नई बात नहीं हैं। वर्षों से ठेके, भुगतान, फाइलों की रफ्तार और कमीशनखोरी को लेकर किस्से-कहानियां सुनाई देती रही हैं। लेकिन जब इन चर्चाओं को कथित तौर पर ऑडियो का सहारा मिल जाए, तो मामला सिर्फ अफवाहों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने लगता है।
इन दिनों एक सरकारी विभाग से जुड़े कुछ ऑडियो चर्चाओं का विषय बने हुए हैं। बताया जा रहा है कि इन ऑडियो में जनहित, विकास कार्यों या सरकारी योजनाओं को बेहतर बनाने की बातें नहीं हो रही हैं। चर्चा इस बात की है कि किस तरह भुगतान की फाइलों को आगे बढ़ाया जाए, किस तरह रकम का हिसाब-किताब तय किया जाए और किस तरह अपनी-अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए। सुनने वालों का कहना है कि बातचीत का अंदाज ऐसा है मानो कोई सरकारी कार्यालय नहीं बल्कि किसी मंडी में सौदेबाजी चल रही हो।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि चर्चा किसी करोड़ों रुपये के घोटाले की नहीं है। रकम अपेक्षाकृत छोटी बताई जा रही है, लेकिन उसे हासिल करने की बेचैनी ऐसी दिखाई दे रही है मानो उसी रकम से दुनिया की सारी खुशियां खरीदी जानी हों। ऑडियो सुनने वालों के बीच यही चर्चा भी चल रहा है कि रकम भले छोटी हो, लेकिन ईमान का मूल्य उससे भी छोटा साबित हो रहा है।
सूत्र बताते हैं कि मामला एक टेंडर और उसके भुगतान से जुड़ा हुआ है। काम पूरा होने के बाद भुगतान की बारी आई तो कथित तौर पर फाइलें नियमों से ज्यादा गणित और गुणा-भाग के आधार पर चलने लगीं। कौन कितना पाएगा, किसकी क्या भूमिका रहेगी और किस स्तर पर क्या व्यवस्था होगी, ऐसी चर्चाएं अब सरकारी गलियारों में कानाफूसी का विषय बनी हुई हैं।
एक समय था जब सरकारी कर्मचारी और अधिकारी जनता की नजर में जवाबदेही और अनुशासन का प्रतीक माने जाते थे। लेकिन ऐसे ऑडियो सामने आने के बाद आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास कार्यों के लिए जारी धन और योजनाओं के बीच यह अदृश्य ‘कट’ संस्कृति कब खत्म होगी?
शासन के गलियारों में भी इन ऑडियो की गूंज सुनाई देने लगी है। हर कोई जानना चाहता है कि आखिर बातचीत करने वाले लोग कौन हैं और यदि ऑडियो सही हैं तो उन पर कार्रवाई कब होगी। हालांकि आधिकारिक स्तर पर अभी तक कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चर्चा इतनी व्यापक हो चुकी है कि इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
विडंबना देखिए कि जिन अधिकारियों पर सरकारी धन की निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, उन्हीं पर अब सवाल उठ रहे हैं। जनता के टैक्स से चलने वाली व्यवस्था में यदि फाइलों का वजन नियमों से नहीं बल्कि दूसरे पैमानों से तय होने लगे, तो फिर जनहित पीछे छूट जाता है और निजी हित सबसे आगे खड़ा दिखाई देता है।
फिलहाल ऑडियो की चर्चा जारी है, सवाल भी जारी हैं और जवाबों का इंतजार भी। लेकिन इतना जरूर है कि इन कथित ऑडियो ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सरकारी दफ्तरों में फाइलें आखिर नियमों से चलती हैं या फिर ‘सेटिंग’ से।

