पंचायत राज विभाग ने ‘उत्तराखंड ग्राम पंचायत नियमावली 2026’ का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है इसका मकसद ग्राम पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना और विकास कार्यों में स्वायत्तता देना है, ताकि ग्राम प्रधान और पंचायत सदस्य गांव के विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकार का मुंह न ताकें।
दावा किया जा रहा है कि पंचायत राज विभाग की इस नियमावली को मंजूरी मिल गई तो उत्तराखंड के गांवों की तस्वीर बदल जाएगी। तय है कि अगर पंचायती राज विभाग के इस ड्राफ्ट को मंजूरी मिली तो गांव में शहरो की तरह कर की वसूली होगी। इस नियमावली के लागू होने के बाद ग्राम पंचायत अपने राजस्व को बढ़ाने के लिए भवन कर, व्यवसाय कर, नक्शा कर और साफ-सफाई जैसे कर वसूलने के लिए आजाद हो जाएगी।
इतना ही नहीं कहा जा रहा है कि नियमावली लागू होने के बाद गांव की जरूरत के हिसाब से ग्राम पंचायत विकास का प्लान खुद ही बना पाएगी। हालांकि अभी तक गांव के विकास का पूरा बजट और योजना राज्य सरकार तय करती थी. नई नियमावली के बाद ग्राम पंचायतें अपने स्तर पर प्राथमिकता तय कर सड़क, नाली, पानी, स्ट्रीट लाइट जैसे काम करा सकेंगी।
माना जा रहा है कि नई नियमावली की जरूरत इसलिए है कि राज्य की नब्बे फीसदी से ज्यादा पंचायतें, सरकारी अनुदान पर निर्भर है। ऐसे में गांव का उतना ही विकास हो पाता है जितना केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की झोली से गांवो को मिलता है।
लेकिन माना जा रहा है कि जब नियमावली लागू हो जाएगी तो ग्राम पंचायतें भी नगर निकाय की तर्ज पर निवासियों से प्रापर्टी कर वसूल कर गांव का विकास कर सकती हैं। पंचायत राज विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, तैयार ड्राफ्ट पर जनता से सुझाव लेने के बाद ही‘उत्तराखंड ग्राम पंचायत नियमावली 2026 से नियमावली लागू की जाएगी।
बहरहाल पंचायती राज विभाग के तैयार ड्राफ्ट में आवासीय भवनों के क्षेत्रफल के आधार पर वार्षिक कर तय किया गया है। 50 वर्ग मीटर तक के मकान पर 300 रुपये, 50 से 100 वर्ग मीटर तक 600 रुपये, 100 से 200 वर्ग मीटर तक 900 रुपये और 200 वर्ग मीटर से बड़े मकान पर 1200 रुपये सालाना टैक्स का प्रावधान किया गया है।
वहीं दुकान, होटल, वैडिंग प्वाइंट जैसे व्यावसायिक भवनों पर 100 रुपये अतिरिक्त कर देना होगा। बेशक विभाग के इरादे नेक हों लेकिन योजना के अमलीजामा पहनने के बाद कई तरह की दिक्कत भी सामने आएंगी।
दरअसल पलायन की पीड़ा भोगते गांवों के भवन स्वामियों को दो-दो जगह का भवनकर भरना पड़ेगा। गांव का भी और सहूलियतों की तलाश के लिए अपनाए कस्बे या शहर के घर का भी। क्योंकी गांव का मकान का स्वामी भी वहीं होगा।
मैदानी इलाकों में शहरों से सटे गांवों में ये भी देखने को मिलेगा कि माता-पिता ने जमीन बेचकर बड़ा मकान बनाया लेकिन बेटे के पास इतना बढ़िया रोजगार न हो कि वो बड़े मकान का भवनकर आसानी से चुका सके। वहीं जिसका मकान ही किसी आवास योजना के तहत बना होगा वो बेचारा क्या टैक्स देगा।
हालांकि नियमावली में विधवा,विकलांक सैनिक, पूर्व सैनिक और सैनिक विधवाओं, कुष्ठ रोगियों, एचआईवी पॉजिटिव मरीज, महिला स्वयं सहायता समूह को टैक्स में पचास फीसद की छूट का प्रावधान किया गया। हालांकि होगा क्या ये तो वक्त ही बताएगा फिलहाल नियमावली को लेकर चौपालों पर चर्चा शुरू हो गई है कि सरकार ग्रामीण जनता को दे क्या रही है जो उससे वसूलने की तैयारी कर दी गई है।

