नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश के करोड़ों छात्रों और अभिभावकों को बड़ी राहत देते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को कड़ा निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अभिभावकों को ‘ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री’ आईडी बनवाने से मना करने या इस योजना से बाहर रहने का स्पष्ट विकल्प दिया जाए। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने चार छात्रों के अभिभावकों की याचिका पर यह बड़ा फैसला सुनाया है।
सर्वोच्च अदालत ने सीबीएसई को ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया है, जिसमें अपार आईडी को स्वैच्छिक रखने और सहमति-पत्र में मना करने का विकल्प देने को कहा गया था। सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि केंद्र सरकार ने ओडिशा हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती नहीं दी है, इसलिए अब इस फैसले को पूरे देश के स्कूलों में लागू कराया जाएगा।
अदालत में दायर याचिका में अभिभावकों ने आरोप लगाया था कि कागजों पर सरकार अपार आईडी को स्वैच्छिक बताती है, लेकिन जमीन पर स्कूल बच्चों और अभिभावकों को इसे बनवाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि स्कूलों द्वारा दिए जा रहे सहमति-पत्र (कंसेंट फॉर्म) में योजना से बाहर रहने का कोई कॉलम या विकल्प ही नहीं दिया जा रहा है, जिससे अभिभावक दबाव महसूस कर रहे थे।
ओडिशा हाईकोर्ट के पिछले आदेश का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सहमति-पत्र में ‘ऑप्ट-आउट’ का विकल्प न होना सरकार के उस दावे को कमजोर करता है जिसमें योजना को पूरी तरह स्वैच्छिक बताया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा को किसी विशिष्ट पहचान व्यवस्था से इस तरह जबरन नहीं जोड़ा जा सकता और अभिभावकों को फैसला लेने की पूरी आजादी होनी चाहिए।
मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अपार आईडी का मूल उद्देश्य हर छात्र को एक विशिष्ट शैक्षणिक पहचान देना है, इसलिए हर प्रशासनिक कदम को संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अभिभावकों के पास इस योजना का हिस्सा न बनने का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए।
आपको बता दें कि अपार योजना के तहत हर स्कूली छात्र को 12 अंकों की एक विशिष्ट और आजीवन मान्य पहचान संख्या जारी की जाती है। यह आईडी छात्र के सभी रिपोर्ट कार्ड, मार्कशीट और सर्टिफिकेट को एक डिजिटल लॉकर में सुरक्षित रखती है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद अब सीबीएसई को अपने सहमति-पत्र और नामांकन प्रक्रिया में बदलाव कर अभिभावकों को ‘इन्कार’ का विकल्प देना होगा।

