देहरादून। 2014 में जिस सोशल मीडिया को नरेंद्र मोदी और भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा हथियार माना गया था, आज वही सोशल मीडिया सरकार के लिए नई चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। कभी इसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता मजबूत किया गया था, लेकिन अब इसी प्लेटफॉर्म पर युवाओं के सवाल, परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के आरोप और सरकार के खिलाफ उठती आवाजें लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं।
तस्वीर का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि जिस हथियार ने कभी चुनावी नैया पार लगाने में अहम भूमिका निभाई, वही अब सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों तक, सोशल मीडिया पर सवालों की गूंज सुनाई दे रही है।
कहीं प्रदर्शनकारियों के वीडियो वायरल हो रहे हैं, कहीं पुलिस की कार्रवाई चर्चा में है तो कहीं सरकार और संबंधित संस्थाओं की चुप्पी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। मुख्यधारा के मीडिया में किसी प्रदर्शन को जितनी जगह मिलती है, सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीर उससे कहीं ज्यादा व्यापक नजर आ रही है। यही वजह है कि अब किसी मुद्दे को नजरअंदाज करना पहले जितना आसान नहीं रह गया है।
सोशल मीडिया का पुराना हथियार, अब नई चुनौती
2014 के लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया ने राजनीतिक प्रचार का तरीका बदलने में बड़ी भूमिका निभाई थी। फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए संदेश सीधे लोगों तक पहुंचाए गए। समर्थकों ने डिजिटल अभियान चलाए, युवाओं को जोड़ा और राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी। उस दौर में सोशल मीडिया को भाजपा की चुनावी सफलता के अहम कारकों में गिना गया।
लेकिन समय का पहिया घूम चुका है। अब यही प्लेटफॉर्म केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि सवाल पूछने, विरोध दर्ज कराने और सरकारी दावों की पड़ताल करने का मंच भी बन गया है। युवा अपनी बात रखने के लिए किसी संपादकीय की अनुमति या टीवी स्टूडियो में जगह मिलने का इंतजार नहीं करते।
मोबाइल कैमरा, इंटरनेट कनेक्शन और कुछ सेकंड का वीडियो किसी मुद्दे को देशव्यापी बहस में बदल सकता है। पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने युवाओं के बीच गुस्से और निराशा को जन्म दिया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर इस्तीफे की मांग से लेकर चुनाव आयोग और उसके नेतृत्व पर उठते सवालों तक, सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस तेज दिखाई देती है।
हालांकि, किसी व्यक्ति के इस्तीफे या किसी विवाद के पीछे की परिस्थितियों को लेकर तथ्य और आरोप अलग-अलग करके देखना जरूरी है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से जुड़ी चर्चाओं को भी इसी संदर्भ में समझना होगा; मांग उठना और इस्तीफा हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं।
टीवी की खामोशी, मोबाइल की आवाज
किसी प्रदर्शन को मुख्यधारा के मीडिया में पर्याप्त जगह मिले या नहीं, सोशल मीडिया पर उसकी मौजूदगी कई बार अलग तस्वीर पेश करती है। प्रदर्शनकारियों के अनुभव, पुलिस की कार्रवाई के दृश्य और मौके से सामने आने वाली प्रतिक्रियाएं तेजी से साझा होती हैं। हालांकि, वायरल वीडियो पूरी घटना का प्रतिनिधित्व करते हैं या नहीं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि भी जरूरी है।
डिजिटल दुनिया में आवाज जितनी तेजी से फैलती है, भ्रामक जानकारी फैलने का खतरा भी उतना ही रहता है। फिर भी एक बात स्पष्ट है—आज जनता के सवालों को केवल इसलिए दबाया नहीं जा सकता कि उन्हें किसी बड़े मंच पर जगह नहीं मिली। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने नागरिकों को अपनी बात रखने का ऐसा माध्यम दिया है, जिसकी पहुंच और गति दोनों राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
पांच राज्यों के चुनाव, सरकार के लिए संदेश?
आने वाले समय में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच युवाओं की नाराजगी, SIR पर उठते सवाल और सोशल मीडिया पर चल रही बहस राजनीतिक दलों के लिए अहम मुद्दे बन सकते हैं। हालांकि, ऑनलाइन नाराजगी अपने आप में चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी नहीं करती। उसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने लोग इन मुद्दों को मतदान के समय प्राथमिकता देते हैं और राजनीतिक दल उनका समाधान किस तरह पेश करते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही है कि सोशल मीडिया किसी एक दल की स्थायी जागीर नहीं है। 2014 में जिसने राजनीतिक प्रचार को नई ताकत दी, आज वही मंच सरकार से जवाब मांगने वालों की आवाज भी बन रहा है। सत्ता के लिए चुनौती सिर्फ विरोध के वीडियो वायरल होना नहीं, बल्कि उन सवालों का जवाब देना है जो युवाओं के भविष्य, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े हैं।
कभी सोशल मीडिया से चुनावी नैया पार लगाने की रणनीति बनाई गई थी, अब उसी डिजिटल लहर के सामने सरकार को अपनी नीतियों और फैसलों का हिसाब देना पड़ रहा है। आने वाले चुनावों में यह लहर कितना असर दिखाएगी, इसका फैसला जनता करेगी—लेकिन इतना तय है कि मोबाइल की स्क्रीन पर उठते सवालों को अनसुना करना अब पहले जितना आसान नहीं रहा।

