उत्तराखंड के स्कूलों में अनिवार्य होगी मानसिक स्वास्थ्य जांच, तैयार हो रही SOP

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देहरादून। उत्तराखंड के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए स्वास्थ्य विभाग और बेंगलुरु स्थित निमहंस संस्थान की पहल पर मानसिक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। देहरादून से मुख्य संवाददाता के अनुसार, राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने जानकारी दी है कि निमहंस और स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सर्वे में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर आए चौंकाने वाले आंकड़ों के बाद यह फैसला लिया जा रहा है। इस नए कदम का सीधा असर प्रदेश के हजारों स्कूली छात्रों और उनके अभिभावकों पर पड़ेगा।

दरअसल, स्वास्थ्य विभाग और निमहंस बेंगलुरु की ओर से पिछले साल राज्य भर में बच्चों की जीवनशैली को लेकर एक व्यापक सर्वे कराया गया था। इस सर्वे रिपोर्ट में सामने आया कि बदलती दिनचर्या और परवरिश में आ रही कमियों के कारण बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य गंभीर खतरे में पड़ रहा है। रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि समय रहते यदि बच्चों की इस स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

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सर्वे में सामने आए इन गंभीर तथ्यों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने अब स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग को अनिवार्य बनाने की योजना तैयार की है। इसके लिए प्रदेश के सभी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों के लिए एक विशेष मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार की जा रही है। स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि प्रारंभिक स्तर पर ही बच्चों की मानसिक समस्याओं को पहचानकर उन्हें सही इलाज और काउंसलिंग दी जा सकेगी।

निमहंस और स्वास्थ्य विभाग के इस अध्ययन में बच्चों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल का बढ़ता चस्का एक सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है। इसके साथ ही बच्चों में टीवी देखने की लत और स्क्रीन टाइम का अत्यधिक बढ़ना चिंताजनक स्तर पर पाया गया है। इसके अलावा खानपान की गलत आदतों और जंक फूड के अत्यधिक सेवन से भी बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर पड़ रहा है।

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रिपोर्ट में इस बात का भी प्रमुखता से जिक्र किया गया है कि कामकाजी माता-पिता की व्यस्तता के कारण बच्चों के लालन-पालन पर विपरीत असर पड़ रहा है। बच्चों को पर्याप्त समय न मिलने और उनका झुकाव डिजिटल गैजेट्स की तरफ बढ़ने से उनके व्यवहार में आक्रामकता और तनाव देखा जा रहा है। इसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए स्कूल स्तर पर अनिवार्य जांच का ढांचा खड़ा किया जा रहा है।

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बच्चों के सर्वांगीण विकास पर बात करते हुए पूर्व स्वास्थ्य महानिदेशक और वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. डीएस रावत का कहना है कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए शुरुआती उम्र से ही उनकी आदतों पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि बच्चों का सही खानपान और उनका रूटीन उनकी दिमागी क्षमता को तय करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को जंक फूड और मोबाइल स्क्रीन से दूर रखकर ही उनके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए अभिभावकों को भी अपने बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने की जरूरत है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा तैयार की जा रही एसओपी के लागू होते ही उत्तराखंड के सभी निजी और सरकारी स्कूलों में अनिवार्य मानसिक स्क्रीनिंग अभियान की शुरुआत कर दी जाएगी।