उत्तराखंड सरकार ने केदारनाथ, यमुनोत्री, हेमकुंड साहिब और आदि कैलाश यात्रा मार्गों पर घोड़ा-खच्चरों के संचालन को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने के लिए एक नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तत्काल प्रभाव से लागू कर दी है। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य एक तरफ जहां चारधाम आने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा को सुरक्षित और सुगम बनाना है, वहीं दूसरी तरफ यात्रा मार्गों पर काम करने वाले बेजुबान पशुओं के कल्याण और उनके संरक्षण को प्राथमिकता देना है।
उच्च न्यायालय नैनीताल और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के अनुरूप तैयार की गई इस एसओपी के तहत सभी पशुओं का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। अपर सचिव संतोष बडोनी के निर्देशों के अनुसार, यात्रा मार्गों पर भीड़ और दबाव को नियंत्रित करने के लिए घोड़ा-खच्चरों की अधिकतम संख्या भी तय कर दी गई है, जिसके तहत केदारनाथ मार्ग पर अधिकतम 5000, हेमकुंड साहिब मार्ग पर लगभग 1050 और यमुनोत्री मार्ग पर लगभग 595 घोड़ा-खच्चरों को ही संचालन की अनुमति मिलेगी।
किसी भी पशु को मार्ग पर उतारने से पहले उसका स्वास्थ्य परीक्षण, ग्लैंडर्स जांच, ईयर टैगिंग और माइक्रोचिपिंग कराना अनिवार्य होगा, जिसके बाद मिलने वाले स्वास्थ्य प्रमाणपत्र की वैधता 45 दिन रहेगी और बिना पंजीकरण वाले पशुओं के संचालन पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा।
वॉटरप्रूफ काठियां और सीसीटीवी से होगी सख्त निगरानी
पशु कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए नई एसओपी में यह अनिवार्य किया गया है कि यात्रा मार्गों पर प्रत्येक एक किलोमीटर की दूरी पर पशु स्वामियों को पशुओं के लिए स्वच्छ और गुनगुने पेयजल की पुख्ता व्यवस्था करनी होगी। इसके साथ ही पशुओं के लिए पौष्टिक चारा और इलेक्ट्रोलाइट उपलब्ध कराना भी अनिवार्य किया गया है।
बेजुबान जानवरों को घाव या किसी भी प्रकार की शारीरिक क्षति से बचाने के लिए उन पर केवल हल्की और वॉटरप्रूफ काठियों का उपयोग करने पर विशेष जोर दिया गया है। इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए पानी के ट्रफ और संवेदनशील स्थानों के पास सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे, जबकि प्रत्येक जिले में इसकी देखरेख के लिए समर्पित अधिकारी और पशु चिकित्सक नामित किए जाएंगे।
पशुओं को पीटने, तेज दौड़ाने पर सीधे दर्ज होगी FIR
नई गाइडलाइंस में पशु क्रूरता को रोकने के लिए बेहद कड़े दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं, जिसके तहत पशुओं पर उनकी क्षमता से अधिक भार लादने, घायल या बीमार पशुओं से काम लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। बिना वैध टोकन के संचालन करने, पशुओं को निर्दयतापूर्वक पीटने, उन्हें क्षमता से तेज गति से दौड़ाने और उनके ईयर टैग या माइक्रोचिप के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने पर सख्त रोक है।
यदि कोई भी व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करते हुए दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके अतिरिक्त, संबंधित पशु स्वामी का लाइसेंस तुरंत रद्द कर उसे ब्लैकलिस्ट किया जाएगा, पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई जाएगी और प्रत्येक पशु के साथ एक संचालक की भौतिक उपस्थिति को भी अनिवार्य बनाया गया है।
यात्रा मार्गों पर 24 घंटे इलाज की सुविधा
श्रद्धालुओं और पशुओं की सुविधा के लिए यात्रा मार्गों पर स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार के पशु चिकित्सालय स्थापित किए जाएंगे, जहां योग्य पशु चिकित्सकों और पैराविशेशज्ञ कर्मियों की तैनाती चौबीसों घंटे रहेगी। बीमार, घायल या रास्ते में लावारिस छोड़ दिए गए पशुओं के त्वरित उपचार और उनके समुचित संरक्षण के लिए हर सप्ताह 24 घंटे चिकित्सा कक्ष की सुविधा क्रियाशील रहेगी।
यदि यात्रा के दौरान किसी पशु की मृत्यु हो जाती है, तो उसके शव का पूरी तरह वैज्ञानिक विधि से निस्तारण किया जाएगा और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए पोस्टमार्टम की बकायदा वीडियोग्राफी भी कराई जाएगी। इस पूरी व्यवस्था को धरातल पर कड़ाई से लागू करने के लिए एक विशेष ‘म्यूल टास्क फोर्स’ का गठन किया गया है, जो अतिरिक्त चेक पोस्टों की स्थापना और रात्रि गश्त के माध्यम से नियमों की अवहेलना करने वालों पर पैनी नजर रखेगी।

