Uttarakhand: 5 साल बाद शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा, जानें नए रास्ते और सुविधाएं

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देहरादून। कोरोना महामारी और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के चलते पिछले पांच वर्षों से स्थगित रही ऐतिहासिक कैलाश मानसरोवर यात्रा एक बार फिर आधिकारिक रूप से शुरू हो गई है। 5 साल बाद यात्रा के पुनः आरंभ होने से देशभर के श्रद्धालुओं में भारी उत्साह है। इस बार भारत और चीन दोनों ओर से सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, सड़कों और हाई-अल्टीट्यूड स्वास्थ्य सुविधाओं में व्यापक सुधार किया गया है।

मार्ग में हुए बदलावों के कारण इस बार यात्रा अधिक सुव्यवस्थित नजर आ रही है। दोनों देशों की सीमाओं के भीतर पक्की सड़कें, सुविधाजनक पड़ाव स्थल और कठिन परिस्थितियों के लिए आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है, जिससे तीर्थयात्रियों को पहले की तुलना में कम परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

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यात्रा का पहला मुख्य आध्यात्मिक पड़ाव ‘राक्षस ताल’ झील है, जिसे पौराणिक मान्यताओं में रावण की तपस्थली माना जाता है। यहां तीर्थयात्री झील के किनारे पत्थरों से छोटी-छोटी मीनारें बनाकर सुखद यात्रा की मन्नत मांगते हैं। पांच साल बाद बड़ी संख्या में भारतीय श्रद्धालुओं की मौजूदगी से भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक संपर्क भी फिर से बहाल होता दिख रहा है।

राक्षस ताल के समीप स्थित पवित्र मानसरोवर झील के दर्शन के बाद यात्रा का सबसे दुर्गम और चुनौतीपूर्ण चरण ‘यमद्वार’ से शुरू होता है। यहीं से कैलाश पर्वत की 52 किलोमीटर लंबी पैदल परिक्रमा की शुरुआत होती है, जहां यात्री सभी सांसारिक बंधनों को पीछे छोड़कर केवल भक्ति भाव के साथ आगे बढ़ते हैं।

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परिक्रमा मार्ग पर स्थित ‘डोलमा पास’ की चढ़ाई को सबसे कठिन माना जाता है। 18,600 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित इस दर्रे में ऑक्सीजन की कमी और घटता तापमान यात्रियों की शारीरिक क्षमता की परीक्षा लेता है। हालांकि, इस बार तैनात मेडिकल टीमों और बेहतर तैयारियों के चलते यात्रियों को समय पर सहायता मिल रही है।

इस बार की यात्रा में युवाओं, कॉर्पोरेट पेशेवरों, बुजुर्गों और डॉक्टरों का दल शामिल है, जो विपरीत मौसम के बावजूद एक-दूसरे का सहयोग करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। धुंध छंटने पर जब पवित्र कैलाश शिखर का पहला दर्शन होता है, तो श्रद्धालुओं का सारा कष्ट दूर हो जाता है और पूरा माहौल शिवभक्ति के जयकारों से गुंजायमान हो उठता है।

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सड़कों और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार ने भले ही यात्रा की शारीरिक थकान को कुछ कम किया हो, लेकिन कैलाश मानसरोवर यात्रा का धार्मिक महत्व, प्राकृतिक रोमांच और आध्यात्मिक प्रभाव आज भी पहले की तरह अटूट और असीम बना हुआ है।

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