कहीं कमजोर हाथों में तो नहीं सिस्टम….? सरकारी तनख्वाह, निजी प्रचार, दून मेडिकल हॉस्पिटल के डिप्टी एमएस की दोहरी भूमिका पर चर्चा तेज…

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देहरादून। राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में शुमार दून मेडिकल कॉलेज एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था और आचरण नियमों को लेकर चर्चा में है। अस्पताल में तैनात डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. विनम्र मित्तल का पोस्टर जो उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से जारी किया था उस पर सवाल उठने लगे हैं। दरअसल सरकारी पद पर रहते हुए वे अपने निजी क्लीनिक के प्रचार-प्रसार में अधिक रुचि दिखा रहे हैं, जो कि सेवा नियमों के खिलाफ माना जा रहा है।
अस्पताल के एमएस डॉ. आर.एस. बिष्ट ने इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि यदि कोई भी अधिकारी सरकारी सेवा में रहते हुए निजी लाभ ले रहा है तो यह स्पष्ट रूप से सेवा नियमों का उल्लंघन है। उनके अनुसार, “सर्विस रूल के तहत इस प्रकार की गतिविधियां अनुशासनहीनता के दायरे में आती हैं। यदि मामला संज्ञान में आता है तो नियमानुसार कार्रवाई भी की जानी चाहिए। जानकारों के अनुसार, डिप्टी एमएस जैसे प्रशासनिक पद पर तैनात अधिकारी का प्राथमिक दायित्व अस्पताल की व्यवस्थाओं को सुचारु रखना, मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना और चिकित्सकीय स्टाफ के कार्यों की निगरानी करना होता है। लेकिन जब डॉक्टर अपने ही क्लिनिक के प्रचार प्रसार में व्यस्त हो तो भला सरकारी सिस्टम पर ध्यान केंद्रित कैसे होगा ?? संबंधित चिकित्सक अस्पताल के प्रचार से अधिक अपने निजी क्लीनिक के प्रचार-प्रसार में सक्रिय नजर आए हैं। अस्पताल परिसर और बाहरी क्षेत्रों में उनके निजी क्लीनिक से जुड़ी चर्चाएं लगातार उठ रही हैं, जिससे सरकारी पद की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है। गौरतलब है कि दून मेडिकल कॉलेज प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी मेडिकल संस्थान है, जहां रोजाना हजारों मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में यहां तैनात किसी भी अधिकारी की भूमिका केवल चिकित्सकीय ही नहीं बल्कि प्रशासनिक रूप से भी बेहद अहम होती है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से समय-समय पर सख्त निर्देश जारी किए जाते रहे हैं कि सरकारी चिकित्सक सेवा अवधि के दौरान किसी भी प्रकार के निजी लाभ से जुड़े प्रचार-प्रसार से दूर रहें। इसके बावजूद यदि इस तरह के मामले सामने आते हैं तो यह न केवल संस्थान बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की साख पर असर डालता है।
जानकारों का कहना है कि संविदा पर नियुक्त अधिकारियों के लिए भी वही सेवा नियम लागू होते हैं जो नियमित अधिकारियों पर लागू होते हैं। ऐसे में यदि कोई अधिकारी सरकारी अस्पताल में तैनात हो कर अपनी पहचान और पद का इस्तेमाल निजी क्लीनिक के प्रचार के लिए करता है तो यह हितों के टकराव (Conflict of Interest) की श्रेणी में आ सकता है। इससे न केवल पारदर्शिता प्रभावित होती है बल्कि मरीजों के भरोसे पर भी असर पड़ता है।
अस्पताल के एमएस डॉ. आर एस बिष्ट ने बताया कि इसका परीक्षण कराया जा रहा है।
यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब राज्य सरकार लगातार स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने के दावे कर रही है। उच्च स्तर से अस्पतालों में अनुशासन और पारदर्शिता बनाए रखने के निर्देश दिए जाते रहे हैं। लेकिन यदि उन्हीं आदेशों का पालन धरातल पर नहीं हो पा रहा है, तो इससे सिस्टम की कार्यक्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मरीजों और तीमारदारों का भी कहना है कि सरकारी अस्पतालों में तैनात अधिकारियों को पूरी निष्ठा के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। उनका मानना है कि यदि प्रशासनिक पद पर बैठा व्यक्ति निजी प्रचार में व्यस्त रहेगा तो अस्पताल की व्यवस्थाएं प्रभावित होना तय है।
फिलहाल मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि सरकारी तंत्र इस प्रकरण को किस गंभीरता से लेता है और क्या वाकई सेवा नियमों के तहत कोई कार्रवाई की जाती है या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाता है ।।

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