डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसला भारतीय रुपया, 96 के पार बंद होने से बढ़ी चिंता

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वैश्विक और घरेलू आर्थिक मोर्चों पर पैदा हुई कई बड़ी चुनौतियों के चलते भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले रिकॉर्ड स्तर पर बंद हुआ है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा मुद्रा बाजार को संभालने की तमाम कोशिशों के बावजूद विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में सोमवार को रुपया 39 पैसे की एक और बड़ी गिरावट के साथ पहली बार 96 के ऐतिहासिक स्तर से भी नीचे चला गया और अंत में 96.20 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ।

अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में कारोबार की शुरुआत ही कमजोरी के साथ 96.19 पर हुई थी, जो सत्र के दौरान टूटकर एक समय 96.39 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गई थी। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं और केंद्रीय बैंक की ओर से बाजार में कोई बड़ा हस्तक्षेप नहीं होता है, तो आने वाले समय में रुपये की कीमत गिरकर 102 के स्तर को भी छू सकती है, जिससे देश का आयात बिल और अधिक बढ़ जाएगा।

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एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन

आंकड़ों के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारतीय रुपये का प्रदर्शन अन्य सभी प्रमुख एशियाई मुद्राओं के मुकाबले सबसे खराब रहा है, जहां इस साल अब तक रुपये में 7.04 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की जा चुकी है। एलकेपी सिक्योरिटीज के कमोडिटी-करेंसी रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक संकट और विशेष रूप से ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 फीसदी का भारी उछाल आया है, जिसके कारण सोमवार को ब्रेंट क्रूड उछलकर 111 डॉलर प्रति बैरल के दो सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल की इन आसमान छूती कीमतों और डॉलर की वैश्विक मजबूती ने मिलकर भारतीय रुपये को लगातार नीचे की ओर धकेला है, जिससे तकनीकी रूप से अब रुपये के लिए 96.55 के स्तर पर एक नया सपोर्ट देखा जा रहा है, जबकि तत्काल रुकावट 96.00 से 96.10 के आसपास बनी हुई है।

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इस समय भारतीय मुद्रा पर मुख्य रूप से तीन अलग-अलग मोर्चों से भारी दबाव बना हुआ है, जिसमें सबसे बड़ा कारण घरेलू वित्तीय बाजारों से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा की जा रही लगातार चौतरफा बिकवाली है। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने साल 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजारों से करीब 2.19 लाख करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचकर अपनी पूंजी बाहर निकाल ली है।

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विदेशी निवेशकों की इस रिकॉर्ड बिकवाली, कच्चे तेल के बढ़ते आयात खर्च और बॉन्ड यील्ड में आ रही तेजी के कारण डॉलर को लगातार मजबूती मिल रही है, जिसका सीधा और नकारात्मक असर न केवल भारतीय रुपये पर बल्कि दुनिया भर की अन्य प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर भी साफ देखा जा सकता है।

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