‘छुपकर नहीं, गाजे-बाजे के साथ लूंगा संन्यास’…हरीश रावत का विरोधियों पर तीखा जुबानी हमला

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देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने अपनी ही पार्टी के सहयोगियों और राजनीतिक विरोधियों द्वारा उनके संन्यास को लेकर चलाई जा रही चर्चाओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट जारी कर साफ शब्दों में कहा है कि कुछ लोगों ने उनसे सक्रिय राजनीति से संन्यास दिलवाने की ‘सुपारी’ ले रखी है। हालांकि, पूर्व सीएम ने स्पष्ट किया कि वे फिलहाल संन्यास नहीं ले रहे हैं और जब भी ऐसा निर्णय लेंगे, तो वह छुप-छुपाकर नहीं बल्कि पूरे गाजे-बाजे के साथ सार्वजनिक रूप से करेंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वे संन्यास को जीवन की उच्चतम स्थिति मानते हैं और भविष्य में उस अवस्था में जाने के अभिलाषी भी हैं। लेकिन उन्होंने अपने विरोधियों को दोटूक संदेश देते हुए कहा कि जिस दिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व या देहरादून के उनके सहयोगी उनसे संन्यास की अपेक्षा करेंगे, वे ससम्मान धन्यवाद देते हुए उस सलाह को सभी के साथ साझा करेंगे।

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हरीश रावत ने अपने राजनीतिक आलोचकों को ‘चितकबरा चहेता’ करार देते हुए कहा कि उनका लगभग 60 से 62 वर्षों का राजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा है। इतने लंबे सफर से संन्यास का ऐलान किसी से छिपाकर नहीं होगा। जिस दिन वे राजनीति को अलविदा कहेंगे, उस दिन उत्तराखंड के सभी भाई-बहनों और कार्यकर्ताओं का धन्यवाद करेंगे और खुशी-खुशी अपने शेष जीवन का नया रोडमैप भी घोषित करेंगे।

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अपने बयान में कांग्रेस नेता ने खुलासा किया कि दूसरी पार्टियों के कुछ सक्रिय और अर्ध-सक्रिय शुभचिंतक भी उन्हें राजनीति छोड़ने की सलाह दे रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ये ‘चितकबरे चहेते’ न केवल उन्हें संन्यास दिलवाना चाहते हैं, बल्कि उत्तराखंड और अन्य राज्यों में कांग्रेस की सभी चुनावी हारों का ठीकरा भी उनके सिर पर फोड़ना चाहते हैं।

अपनी राजनीतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए हरीश रावत ने स्वीकार किया कि वे अपने जीवन में जितने चुनाव जीते हैं, उससे अधिक चुनाव हारे हैं। लेकिन हर हार के बाद वे जीत के नए संकल्प के साथ खड़े हुए हैं और आगे बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि आज भी वे उसी संकल्प के साथ मैदान में डटे हुए हैं, क्योंकि हार और जीत जनता-जनार्दन के हाथ में होती है।

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पूर्व सीएम ने कहा कि अल्मोड़ा के मोहनरी जैसे छोटे से गांव से लेकर राष्ट्रीय पटल तक की उनकी यात्रा संघर्ष और प्रार्थना की कहानी रही है। उन्होंने माना कि इस यात्रा में कुछ लोगों को राजनीतिक नुकसान महसूस हुआ होगा, लेकिन जो भी उनके पास आया, उन्होंने हमेशा उसकी मदद की है। हरीश रावत के इस बयान से उत्तराखंड कांग्रेस और राज्य की प्रादेशिक राजनीति में नया सियासी घमासान छिड़ गया है।

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