हिमनद झीलों के खतरे से निपटेगा उत्तराखंड, वसुंधरा झील पर लगेगा ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’

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देहरादून। उत्तराखंड में हिमनद झीलों से होने वाले संभावित खतरों से निपटने के लिए राज्य सरकार और केंद्रीय संस्थानों ने अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा दिए हैं। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुड़की पिछले तीन वर्षों से इस तकनीक पर काम कर रहा है और अब इसके प्रायोगिक परीक्षण की तैयारी की जा रही है। आपदा प्रबंधन विभाग ने चमोली जिले में स्थित अत्यंत संवेदनशील वसुंधरा झील पर इस सिस्टम को स्थापित करने के लिए सैद्धांतिक सहमति दे दी है।

राज्य में हिमनद झीलों के अचानक फटने या जल विस्फोट के गंभीर जोखिमों को देखते हुए यह सुरक्षात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। प्रदेश के भीतर लगातार संवेदनशील हिमनद झीलों की पहचान की जा रही है, उनका अध्ययन किया जा रहा है और अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की योजना पर काम हो रहा है। इसके लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को आवश्यक धनराशि भी जारी कर दी है।

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आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि सीबीआरआई रुड़की द्वारा अर्ली वार्निंग सिस्टम को लेकर किया जा रहा कार्य अत्यंत सकारात्मक प्रयास है। परीक्षण के तौर पर इसे चमोली जिले की ऊंचाई पर स्थित वसुंधरा झील पर लगाया जाना है, जिसके लिए विभाग सहमत हो गया है। हालांकि, सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस दुर्गम क्षेत्र में यह सिस्टम लगाया जाना है, वहां कम्यूनिकेशन और दूरसंचार सुविधाओं को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती रहेगा।

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तकनीकी कार्यप्रणाली के तहत इस अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम में उन्नत सेंसर और सीसीटीवी कैमरे लगे होंगे। इनके माध्यम से रियल टाइम में झील के जल स्तर, पानी के बहाव और ऊंचाई में होने वाले बदलावों की सटीक जानकारी मिलेगी। इसके अलावा, झील के कैचमेंट एरिया और स्थानीय मौसम का डेटा भी दर्ज होगा। कैमरे रियल टाइम तस्वीरें कंट्रोल रूम में भेजेंगे, जिससे सेंसर के आंकड़ों की पुष्टि होगी और किसी भी असामान्य बदलाव पर तुरंत अलर्ट जारी किया जा सकेगा।

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इस पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों के आधार पर भविष्य में राज्य की अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों पर भी यह सिस्टम लगाया जाएगा। मामले पर आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने बताया कि प्रदेश की हिमनद झीलों के व्यापक अध्ययन का काम जारी है और सीबीआरआई की इस पहल को राज्य के आपदा प्रबंधन अभियानों से जोड़ा जाएगा। इस प्रणाली के सफल क्रियान्वयन से निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को समय रहते अलर्ट मिल सकेगा, जिससे जन-धन की हानि रोकी जा सकेगी।

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