देहरादून। गंगा नदी के तटों पर मूल व प्राकृतिक वनस्पतियों को हटाकर बाहरी पेड़-पौधों का अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। इसके चलते गंगा के तटीय इलाकों में बाढ़ और मिट्टी के भीषण कटाव का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा गोमुख से लेकर बंगाल की खाड़ी तक किए गए एक व्यापक सर्वे में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है। अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में गंगा के लगभग 16 फीसदी तटवर्ती हिस्से में बाहरी पेड़-पौधे फैल चुके हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
WII के वैज्ञानिकों का कहना है कि आक्रामक और बाहरी प्रजातियों के बढ़ते दबाव के कारण स्थानीय पारंपरिक वनस्पतियां लगातार पीछे छूटती जा रही हैं। इसका सीधा असर गंगा के तटों पर मिट्टी और बालू को मजबूती से बांधकर रखने वाली प्राकृतिक क्षमता पर पड़ रहा है। संस्थान ने पहली बार पूरे गंगा बेसिन के स्तर पर तटवर्ती वनस्पतियों का एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित डेटा तैयार किया है, जिसके आधार पर इस पर्यावरणीय संकट की गंभीरता सामने आई है।
संस्थान के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2023 से 2025 के बीच गोमुख से बंगाल तक कुल 35 जैव विविधता मूल्यांकन इकाइयों में यह विस्तृत सर्वे आयोजित किया था। दो साल तक चले इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने करीब 750 पादप प्रजातियों का रिकॉर्ड दर्ज किया, जिनमें 735 एंजियोस्पर्म, 7 जिम्नोस्पर्म और 5 टेरिडोफाइट प्रजातियां शामिल हैं। सर्वे में नदी तट से 1 मीटर, 500 मीटर और 1000 मीटर की दूरी पर मौजूद वनस्पतियों का अलग-अलग स्तर पर विश्लेषण किया गया।
शोध के नतीजों से पता चलता है कि नदी के बिल्कुल समीप यानी 1 मीटर के दायरे में बाढ़-सहनशील प्राकृतिक वनस्पतियां अब भी बची हुई हैं। हालांकि, नदी से 500 मीटर और उससे आगे 1000 मीटर तक के क्षेत्र में प्राकृतिक देसी वनस्पतियों का दायरा बेहद तेजी से सिमटा है। इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कृषि गतिविधियों, बस्तियों के बसने और व्यावसायिक वृक्षारोपण ने गंगा तट की मूल वनस्पतियों का स्थान ले लिया है।
पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि तटों पर वनस्पति आवरण कमजोर होने से बारिश और तेज बहाव के दौरान मिट्टी बहकर सीधे नदी में समा रही है। नदी में बड़े पैमाने पर गाद और तलछट जमा होने से नदी का तल लगातार ऊंचा हो सकता है। यदि नदी का तल ऊंचा होता है, तो भविष्य में मानसूनी बाढ़ के दौरान गंगा नदी की जलधारण क्षमता और स्वाभाविक जल प्रवाह पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।

