उर्दू शायरी के एक सुनहरे युग का अंत, दिलों में अमर रहेंगे उनके शेर

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उर्दू शायरी की दुनिया को अपनी मखमली आवाज और संजीदा लफ्जों से सजाने वाले अजीम शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे, जिससे ऐसा महसूस हो रहा है कि भाषा के आंगन में उर्दू की धूप हमेशा के लिए थोड़ी कम हो गई है। उनके जाने से साहित्य जगत में जो शून्यता आई है, उसे कभी भरा नहीं जा सकता, लेकिन सच यह भी है कि वे अपनी शायरी के जरिए हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे।

बशीर बद्र ने गजल जैसे गंभीर फन को महलों की ऊंची दीवारों से निकालकर आम आदमी की जेब तक पहुंचाया, जहाँ उनके शेर किसी अकेले आदमी के कमरे में, किसी ट्रेन की खिड़की के पास बैठे यात्री के साथ, या किसी छात्र की कॉपी के आखिरी पन्ने पर एक हमसफर की तरह मौजूद रहते हैं। उनकी रचनाओं में कोई दिखावा या घमंड नहीं था, बल्कि वे चाय की भाप की तरह उठकर इंसानी मन के भीतर जमी उदासी को बेहद खामोशी से छू लेते थे।

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जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर ने भी उनके निधन पर गहरा शोक जताते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि आज उर्दू भाषा और अधिक गरीब हो गई है, क्योंकि बशीर साहब ने हमेशा के लिए दुनिया से रुखसती ले ली है।

रिश्तों की संजीदगी को बयां करती थी बशीर साहब की शायरी

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उसमें एक आम इंसान के रोजमर्रा के एहसासों, टूटते हुए घरों, बिखरे रिश्तों और शहरों के सन्नाटे की गहरी छाप दिखाई देती थी। उन्होंने बेहद सरल, आम बोलचाल और देसी शब्दों को शायरी में इतनी खूबसूरती से पिरोया कि वह सीधे सीधे अवाम के दिलों में उतर गई, जैसे उनका यह मशहूर शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में…” मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देता है।

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उनकी शायरी में जहाँ एक तरफ इश्क की खुशबू और हिज्र का सन्नाटा महसूस होता है, वहीं दूसरी तरफ वह जिंदगी की मुश्किल सच्चाइयों को भी बहुत नरमी से सामने रखती है, जिससे इंसान को मुश्किल वक्त में भी एक ठहराव और आंतरिक ताकत मिलती है।

अपनी गजलों-शेरो में पिरोया भारत-पाक बंटवारे का दर्द

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के उस बेहद दौर में बशीर बद्र ने कई ऐसी मर्मस्पर्शी गजलें और शेर लिखे जो आज भी सरहद के दोनों पार के लोगों के दिलों में धड़कते हैं। उनके शेरों की ताकत और स्वीकार्यता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शिमला समझौते के ऐतिहासिक मौके पर पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को बशीर बद्र का एक बेहद मशहूर शेर सुनाया था। उनका वह शेर “दुश्मनी जमकर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों…” आज भी दोनों देशों के रिश्तों, कूटनीति और आपसी संवाद की भावना को बेहद खूबसूरती और सार्थकता के साथ बयां करता है।