देहरादून में भीषण गर्मी का प्रकोप: पारा 41 डिग्री के पार, अब 200 साल पुराने पेड़ों की छांव बनी सहारा

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उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में लगातार दूसरे दिन आसमान से बरसती आग और चिलचिलाती धूप ने जनजीवन को पूरी तरह बेहाल कर दिया है। सुबह नौ बजे से ही तापमान तेजी से चढ़ना शुरू हुआ और दोपहर एक से डेढ़ बजे के बीच पारा रिकॉर्ड 41 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि दून का औसत अधिकतम तापमान सामान्य से पांच डिग्री ज्यादा यानी 40.2 डिग्री दर्ज किया गया है।

इस भीषण गर्मी और चलती लू के कारण वातावरण की आर्द्रता घटकर मात्र 24 फीसदी रह गई है, जिसने लोगों की मुश्किलें अत्यधिक बढ़ा दी हैं। इस जानलेवा तपिश के बीच कचेहरी परिसर और राजपुर रोड पर स्थित करीब दो सौ से तीन सौ साल पुराने विशालकाय पेड़ तपती धूप में लोगों को शीतलता प्रदान कर जीवनदायिनी शरण स्थली साबित हो रहे हैं।

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इन ऐतिहासिक पेड़ों के नीचे न केवल राहगीर, पुलिसकर्मी और अधिवक्ता कुछ पल सुकून के बिता रहे हैं, बल्कि दर्जनों ठेली वाले भी इसकी छांव में अपना रोजगार चला पा रहे हैं।

वातावरण में आर्द्रता का स्तर 30 से 60 फीसदी के सामान्य स्तर से काफी नीचे गिरकर 24 प्रतिशत पर पहुंचने के कारण दून वासियों को कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील ओझा और ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ. पीयूष त्रिपाठी के अनुसार, हवा के अत्यधिक शुष्क होने से लोगों की त्वचा फटने लगी है, होंठ रूखे हो रहे हैं और आंखों में तेज जलन व सूखापन महसूस हो रहा है।

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इसके अलावा, नाक और गले की अंदरूनी सुरक्षात्मक परत (म्यूकस मेम्ब्रेन) के सूखने के कारण वायरस और बैक्टीरिया बहुत आसानी से शरीर में प्रवेश कर रहे हैं, जिससे लोग बीमार पड़ रहे हैं। इस मौसम चक्र के बिगड़ने से दून का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) भी बढ़कर 115 तक पहुंच गया है, जो फेफड़ों के लिए हानिकारक है।

इस बेतहाशा गर्मी के चलते देहरादून की सड़कों और मुख्य बाजारों में दोपहर के समय पूरी तरह सन्नाटा पसरा नजर आ रहा है। सूरज के तीखे तेवरों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुबह 10:45 बजे ही तापमान 36 डिग्री सेल्सियस को छू चुका था, जो दोपहर बाद 41 डिग्री तक जा पहुंचा और शाम साढ़े पांच बजे भी वातावरण में 25 फीसदी ही आर्द्रता बची रही।

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लोग धूप की तपिश से बचने के लिए मजबूरन छाता, चश्मा, दुपट्टा और हेलमेट जैसी चीजों से खुद को पूरी तरह ढककर ही बाहर निकल रहे हैं। पर्यावरणविद् सौम्या प्रसाद और अन्य शिक्षाविदों ने इस मौके पर इन प्राचीन पेड़ों की अहमियत को समझने की अपील की है, जो न केवल प्रदूषण और तापमान को नियंत्रित कर रहे हैं बल्कि संकट की इस घड़ी में हजारों लोगों को मुफ्त में आसरा दे रहे हैं।

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