उत्तराखंड में लोक निर्माण विभाग के अंतर्गत आने वाली 300 से अधिक सड़कों के डामरीकरण और सुधार का काम पूरी तरह ठप हो गया है, जिससे राज्य की सड़कों की हालत बदहाल बनी हुई है। इस संकट की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे आपसी टकराव को माना जा रहा है, जिसके चलते पिछले चार महीनों में तारकोल और इमल्सन की कीमतों में अप्रत्याशित भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
आंकड़ों के अनुसार, बाजार में तारकोल की कीमत ₹45,000 प्रति मीट्रिक टन से बढ़कर सीधे ₹85,000 प्रति मीट्रिक टन तक पहुँच गई है, जबकि इसमें मिलाए जाने वाले इमल्सन की दरें भी ₹82,000 से बढ़कर ₹1,45,000 प्रति मीट्रिक टन हो चुकी हैं। कीमतों में आए इस जबर्दस्त उछाल के कारण ठेकेदारों ने मौजूदा दरों पर काम करने से हाथ खड़े कर दिए हैं और वे बढ़ी हुई दरों पर भुगतान की मांग कर रहे हैं।
वर्तमान में राज्य की इन सड़कों को दुरुस्त करने के लिए विभाग को लगभग 25,000 मीट्रिक टन तारकोल और 2,000 मीट्रिक टन इमल्सन की सख्त जरूरत है, लेकिन शासन स्तर पर बजट और नियमों को लेकर अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं हो पाया है।
इस गंभीर समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले ही अपने नियमों में ढील देते हुए शर्तों में बदलाव कर दिया है, जिसके तहत बढ़ी हुई कीमतों का बोझ सरकार खुद वहन करेगी ताकि विकास कार्य न रुकें। इसी तर्ज पर उत्तराखंड लोनिवि ने भी करीब दो महीने पहले एक प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा था, जिसमें 18 महीने से कम अवधि के टेंडरों में भी ठेकेदारों को बढ़ी हुई दरों पर भुगतान करने की व्यवस्था की गई थी।
हालांकि, वित्त विभाग ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए इसे रोक दिया है, जिसके कारण अब इस मामले को कैबिनेट की मंजूरी के लिए ले जाने की तैयारी की जा रही है। लोनिवि के विभागाध्यक्ष राजेश शर्मा के अनुसार, विभाग की ओर से पूरी फाइल शासन को भेजी जा चुकी है और उम्मीद जताई जा रही है कि कैबिनेट से जल्द ही इस पर हरी झंडी मिल जाएगी। इस प्रशासनिक और वित्तीय देरी के कारण जहाँ एक ओर जनता को बदहाल सड़कों से जूझना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे के विकास कार्यों में लगातार देरी हो रही है।

