उत्तराखंड में चल रही चारधाम यात्रा को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने एक बेहद चिंताजनक और गंभीर चेतावनी जारी की है। पहाड़ी और ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में शून्य डिग्री या उससे भी कम तापमान होने के कारण तीर्थयात्रियों का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ रहा है, यहाँ तक कि यात्रा से पहले खुद को पूरी तरह ‘फिट’ घोषित कराने वाले लोग भी वहाँ जाकर गंभीर रूप से बीमार पड़ रहे हैं।
चारधाम यात्रा के दौरान बीमार होने वाले श्रद्धालुओं में से लगभग 70 प्रतिशत लोग फेफड़ों की गंभीर बीमारी यानी ‘पल्मोनरी एडिमा’ का शिकार हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुले अभी महज एक महीना ही हुआ है, लेकिन अब तक करीब 33 लाख श्रद्धालु यहाँ पहुँच चुके हैं, जिनमें से अकेले केदारनाथ धाम में 468 से ज्यादा श्रद्धालु बीमार हो चुके हैं और चारों धामों को मिलाकर अब तक 150 से अधिक तीर्थयात्रियों की जान जा चुकी है।
चिकित्सकों और वरिष्ठ विशेषज्ञों का कहना है कि इस जानलेवा संकट का सबसे बड़ा कारण श्रद्धालुओं द्वारा की जा रही जल्दबाजी है; लोग एक महीने की इस कठिन यात्रा को मात्र सात दिनों में पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।
दून अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अरुण पांडेय के मुताबिक, जब मैदानी इलाकों से आने वाले लोग बिना रुके अचानक इतनी अधिक ऊंचाई और शून्य डिग्री वाले ठंडे वातावरण में पहुँचते हैं, तो उनके शरीर को नए माहौल में ढलने का समय नहीं मिल पाता। अचानक हुए इस जलवायु परिवर्तन के कारण शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिर जाता है, जिससे फेफड़ों की छोटी रक्त धमनियां सिकुड़ने लगती हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ‘हाइपॉक्सिक पल्मोनरी’ कहा जाता है।
रुद्रप्रयाग के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राम प्रकाश ने इसके वैज्ञानिक पहलू को समझाते हुए बताया कि धमनियों के सिकुड़ने से रक्त का दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे कोशिकाओं से तरल पदार्थ बाहर निकलकर फेफड़ों के ऊतकों और वायु थैलियों में भरने लगता है।
ऐसी स्थिति में ऑक्सीजन खून तक नहीं पहुँच पाती और समय पर उचित इलाज न मिलने के कारण यह स्थिति अत्यंत जानलेवा साबित हो रही है। हालांकि, स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. सुनीता टम्टा के अनुसार, प्रशासन ने बीमार श्रद्धालुओं के लिए अस्पतालों में पुख्ता इंतजाम किए हैं और आपातकालीन स्थिति के लिए हेलीकॉप्टर व एम्बुलेंस सेवाएं लगातार मुस्तैद रखी गई हैं, फिर भी यात्रियों को सलाह दी जा रही है कि वे अपनी यात्रा धीरे-धीरे और रुक-रुक कर पूरी करें ताकि उनका शरीर इस विषम मौसम के अनुकूल ढल सके।

