देहरादून। राज्य का मेडिकल एजुकेशन सिस्टम एक बार फिर कठघरे में खड़ा है। वजह है दून मेडिकल कॉलेज में सामने आया रैगिंग का ताजा मामला, जिसने कॉलेज प्रशासन के साथ-साथ स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि पीड़ित छात्र ने अपनी पीड़ा को जिस तरह शब्दों में बयां किया है, वह किसी एक छात्र की परेशानी नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का आईना नजर आता है। छात्र की ओर से लिखे गए संदेश में कथित तौर पर कहा गया कि “अब पढ़ने का मन नहीं है” और वह करीब छह महीने से मानसिक पीड़ा झेल रहा है।
यह महज कुछ शब्द नहीं हैं, बल्कि मेडिकल कॉलेज की उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल हैं, जहां डॉक्टर बनने का सपना लेकर पहुंचने वाले युवाओं को सुरक्षित और भयमुक्त शैक्षणिक माहौल मिलना चाहिए। जब कोई छात्र महीनों तक कथित मानसिक प्रताड़ना सहने के बाद पढ़ाई से ही मन उचटने की बात कहे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कॉलेज प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कहां थी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दून मेडिकल कॉलेज में एंटी रैगिंग सिस्टम सिर्फ कागजों तक सीमित है? कॉलेज में एंटी रैगिंग सेल मौजूद है, जिम्मेदारियां भी तय हैं और समय-समय पर जागरूकता के दावे भी किए जाते हैं। लेकिन अगर इसके बावजूद छात्र महीनों तक कथित मानसिक पीड़ा से गुजरता रहा, तो फिर यह व्यवस्था किसके लिए बनाई गई है?
दून मेडिकल कॉलेज में यह पहला मौका नहीं है जब रैगिंग को लेकर सवाल उठे हों। पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। हर बार जांच, कमेटी और कार्रवाई की बातें होती हैं, लेकिन सवाल वहीं खड़ा रह जाता है कि आखिर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस और स्थायी व्यवस्था कब बनेगी?
विडंबना देखिए, एक तरफ स्वास्थ्य शिक्षा विभाग मेडिकल कॉलेजों की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करता है, वहीं दूसरी तरफ ग्राउंड जीरो से लगातार ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जो इन दावों की पोल खोलती हैं। कभी मरीजों की व्यवस्था सवालों में होती है, कभी चिकित्सकीय सुविधाएं चर्चा में आती हैं और अब छात्रों की सुरक्षा और मानसिक स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ दून मेडिकल कॉलेज का नहीं, बल्कि पूरे हेल्थ एजुकेशन सिस्टम की मॉनिटरिंग व्यवस्था का है।
जांच पर जांच और कमेटियों पर कमेटियां, क्या यही समाधान है?
किसी घटना के बाद जांच बैठाना आसान है, लेकिन यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि भविष्य में वही घटना दोबारा न हो। यदि हर शिकायत के बाद सिर्फ जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए और कुछ समय बाद मामला फाइलों में दब जाए, तो फिर व्यवस्था बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
एसी कमरों में बैठकर बैठकें करने वाले अधिकारियों को अब यह समझना होगा कि मेडिकल कॉलेज की असली तस्वीर पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन और समीक्षा बैठकों में नहीं, बल्कि ग्राउंड जीरो पर दिखाई देती है। छात्र किस माहौल में पढ़ रहे हैं, जूनियर और सीनियर के बीच संबंध कैसे हैं, शिकायत करने वाले छात्र खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं और शिकायत के बाद उन्हें किस तरह का संरक्षण मिलता है इन सवालों के जवाब कागजी रिपोर्ट से नहीं मिल सकते।
अब जरूरत खाना-पूर्ति वाली कार्रवाई की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की है। रैगिंग की शिकायत पर केवल कमेटी गठित करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। शिकायत की स्वतंत्र निगरानी, पीड़ित छात्र की सुरक्षा, समयबद्ध कार्रवाई और दोषी पाए जाने वालों पर कठोर कदम इन सभी को व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।
दून मेडिकल कॉलेज को विवादों से बाहर निकालने के लिए सिर्फ अधिकारियों की बैठकें काफी नहीं हैं। जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सियों को छोड़ कर ए सी कमरों से बाहर निकलें और कॉलेज की वास्तविक स्थिति को देखें। क्योंकि जब एक छात्र छह महीने की कथित मानसिक पीड़ा के बाद यह लिखने को मजबूर हो कि “अब पढ़ने का मन नहीं है”, तो समझना होगा कि मामला सिर्फ रैगिंग का नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने का है जिसे एक युवा मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेते समय अपने संस्थान और सिस्टम के प्रति लेकर आता है।
अब देखना होगा कि इस बार जांच की फाइल खुलेगी या व्यवस्था की आंखें? क्योंकि सवाल एक छात्र का नहीं है सवाल है कि आखिर दून मेडिकल कॉलेज में छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?

