Dehradun: सामाजिक सरोकार या कानून हाथ में लेने की होड़? राजधानी में नए संगठनों की सक्रियता चर्चा में..

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देहरादून। राजधानी देहरादून में कानून व्यवस्था को लेकर एक नया सवाल तेजी से खड़ा होता दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि शहर में कानून का राज चलेगा या फिर कुछ तथाकथित सामाजिक संगठनों के दबाव और मनमानी के आधार पर व्यवस्था तय होगी?

बीते कुछ समय में राजधानी में ऐसे कई संगठन सक्रिय नजर आ रहे हैं, जो सामाजिक सरोकारों के नाम पर ऐसे मामलों में सीधे हस्तक्षेप करते दिखाई देते हैं, जिन पर कार्रवाई का अधिकार कानून और प्रशासनिक व्यवस्था के पास है। कभी पहाड़-मैदान के नाम पर विवाद खड़ा करने और तोड़फोड़ तक की घटनाएं सामने आती हैं, तो कभी होटल के कमरों की जांच या दरवाजे खुलवाने जैसी कथित गतिविधियां चर्चा में आ जाती हैं।

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अब स्पा सेंटरों में कैमरे लेकर पहुंचने और वहां की गतिविधियों की निगरानी करने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन संगठनों को यह अधिकार किसने दिया कि वे खुद ही जांचकर्ता, शिकायतकर्ता और कार्रवाई करने वाली एजेंसी की भूमिका निभाने लगें?

अगर किसी होटल, सेंटर या संस्थान में कोई गैरकानूनी गतिविधि हो रही है तो उसके लिए पुलिस, प्रशासन और संबंधित विभागों की स्पष्ट व्यवस्था मौजूद है। शिकायत मिलने पर जांच हो सकती है, कार्रवाई हो सकती है और दोषी पाए जाने पर कानून के तहत सजा भी दी जा सकती है।

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लेकिन यदि कोई संगठन खुद कानून हाथ में लेकर किसी परिसर में प्रवेश करता है, लोगों से पूछताछ करता है, कमरे खुलवाता है या कैमरे लेकर पहुंचता है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है। राजधानी में सामाजिक संगठनों की भूमिका पर सवाल नहीं है।

समाज में जागरूकता फैलाना और गलत गतिविधियों के खिलाफ आवाज उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन यह अधिकार कानून को अपने हाथ में लेने का लाइसेंस नहीं बन सकता। किसी भी शिकायत की सत्यता जांचने और कार्रवाई करने की जिम्मेदारी संबंधित सरकारी एजेंसियों की है।

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जरूरत इस बात की है कि पुलिस और प्रशासन ऐसे मामलों में स्पष्ट रुख अपनाने की जरूरत है जिससे कहीं भी अनैतिक काम ना हों। यदि कोई संगठन कानून की सीमा लांघता है तो उसके खिलाफ भी उसी तरह कार्रवाई होनी चाहिए, जैसे किसी आम व्यक्ति के खिलाफ होती है।

वरना आने वाले समय में राजधानी में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र के बजाय अलग-अलग संगठनों के हाथों में जाती दिखाई दे सकती है और यह स्थिति किसी भी सूरत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक संकेत नहीं है।