देहरादून। चुनाव नजदीक आते ही सियासी मैदान में शक्ति प्रदर्शन का दौर तेज होना कोई नई बात नहीं है। राजनीतिक दलों के लिए भीड़ अब सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि अपनी ताकत दिखाने का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है। पहले हजारों की भीड़ के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब कैमरा मैदान का रुख करता है तो तस्वीर कई बार कुछ और ही कहानी बयां करती नजर आती है।
कांग्रेस की आज की रैली में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां कार्यक्रम की शुरुआत खाली कुर्सियों के बीच होती दिखाई दी और देखते ही देखते सियासी दावों पर सवाल खड़े होने लगे। रैली को लेकर बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की चर्चाएं थीं। दावा भी हजारों की भीड़ का किया गया, लेकिन कार्यक्रम के शुरुआती दौर में नजर आई तस्वीरों में कुर्सियां खाली दिखाई दीं।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जिस शक्ति प्रदर्शन की तैयारी की गई थी, वह जमीन पर कितनी मजबूत दिखाई दी? हालांकि राजनीति में भीड़ जुटाना कोई आसान काम नहीं है। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, समर्थकों को मैदान तक लाना और फिर उन्हें कार्यक्रम स्थल पर बनाए रखना अपने आप में बड़ी चुनौती है। लेकिन जब कार्यक्रम की शुरुआत ही खाली कुर्सियों के बीच हो तो विपक्ष के लिए सवाल खड़े करने का मौका अपने आप तैयार हो जाता है।
बताया जा रहा है कि भीड़ जुटाने के लिए संगठन स्तर पर पूरी रणनीति बनाई गई थी। कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कार्यक्रम तक लाने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन मौके पर दिखाई देने वाली तस्वीरों ने इन तैयारियों पर जरूर सवाल खड़े कर दिए। रही-सही कसर मौसम ने पूरी कर दी।
बारिश ने कार्यक्रम के रंग में ऐसा भंग डाला कि मैदान में जुटने वाली भीड़ और आयोजन की व्यवस्थाओं दोनों पर असर दिखाई दिया। अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर चुनावी रण में उतरने से पहले ही शक्ति प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नजर नहीं आता तो आने वाले दिनों में संगठन किस तरह अपनी जमीन मजबूत करेगा?
खास बात यह है कि चुनावी माहौल धीरे-धीरे गर्म हो रहा है। ऐसे समय में हर रैली, हर कार्यक्रम और हर भीड़ का अपना राजनीतिक संदेश होता है। सत्तापक्ष इसे अपने पक्ष में पढ़ेगा तो विपक्ष अपनी रणनीति के हिसाब से इसका जवाब देगा। लेकिन जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि मंच से किए जाने वाले दावों और जमीन पर दिखाई देने वाली तस्वीर में कितना अंतर है। कांग्रेस की इस रैली की तस्वीरें अब सियासी गलियारों में चर्चा का विषय जरूर बन गई हैं। खाली कुर्सियां किसी राजनीतिक दल की पूरी ताकत को बयां करने के लिए काफी है।।

