‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता !’ कुछ यही हाल है, उत्तराखंड संस्कृति विभाग का।यहां सूबे की संस्कृति बचाने के लिए आयोजन नहीं किए जाते, बल्कि कमाई का खेल खेलने और सरकारी खजाने का तेल निकालने के लिए समारोह आयोजित किए जाते हैं। जैसे परचून का व्यापारी ग्राहक को चीनी के दाम कम बताकर दाल के दाम से अपना माल झटक लेता है, उसी अंदाज में सूबे का संस्कृति विभाग काम कर रहा है।
चाहे पांच पैसे में जनरेटर चलवाना हो या पांच पैसे में दो वेटर्स से कार्यक्रम में हाई टी सर्व करवाना हर जगह विभाग काएदे-कानून से चलता महकमा कम तिकड़मबाज डीलर ज्यादा नजर आ रहा है। ये आरोप नहीं है बल्कि सूचना के अधिकार के तहत मिली विभागीय जानकारी है जो महकमे की टेबिल से ही दी गई है।
हालांकि ये अलग बात है कि किसी ने अभी तक संस्कृति विभाग की इस नई संस्कृति पर एक्शन नहीं लिया लेकिन इतना तय है कि महकमे ने जो किया उससे बदनामी की काली स्याही के छीटे दूर-दूर तक गिरे हैं। संस्कृति विभाग ने आयोजनों की आड़ में एक दो बार दांये हाथ से बाया कान नहीं पकड़ा बल्कि कई बार जनता की आंख में बेशर्मी से जानबूझकर वित्तीय अनियमितताओं की धूल झोंकी है।
सूचना के अधिकार के तहत विभाग ने जानकारी दी कि 02 सितबंर2025 को मसूरी के शहीद स्मारक में जो श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया था उसमें 2490 स्क्वायर फीट का पांडल लगाया गया। जबकि पांडल के लिए बिछी कारपेट का बिल 47362 का फाड़ा गया। मतलब 2490 स्क्वायर फीट के पांडल में 3980 स्क्वायर फीट कारपेट बिछा दी।
यही जादू संस्कृति विभाग ने “निनाद महोत्सव” में भी दिखाया। जहां दो पांडल लगाए गए। एक 17028 स्क्वाय फीट का पाइप पांडल और दूसरा 3735 स्क्वायर फीट का वॉटरप्रूफ पांडल। लेकिन यहां बिछाई गई कारपेट के बिल का पेमेंट 19 लाख3 हजार 8 सौ 21 रूपए 50 पैसे किया। मतलब कुल दोनो पांडल लगे 20763 स्क्वायर फीट के और कारपेट बिछाई 31997 स्कॉवर फीट। टेंट कम और कारपेट ज्यादा।
इस भुगतान से साफ जाहिर हो गया है कि संस्कृति विभाग के कारिंदे नौकरी कम और डीलिंग जैसा खेल ज्यादा खेल रहे हैं। मानो महकमा न हो बल्कि उन्हें मेले में तंबोला का स्टॉल थमा दिया हो जहां दो के चार बनाने ही, बनाने हैं।
खैर संस्कृति विभाग अपने हेराफेरी के धंधे को यही तक रखता तो गनीमत थी,लेकिन संस्कृति विभाग ने अपने इस घिनौने खेल से उस पावन स्थल को भी नहीं बख्शा जिसे हर उत्तराखंडी तीर्थ स्थल समझता है। संस्कृति विभाग ने रामपुर तिराहे के शहीद स्मारक पर हर साल आयोजित किए जाने वाले श्रंद्धाजलि कार्यक्रम में भी वहीं खेल, खेल दिया।
संस्कृति विभाग को 02 अक्टूबर 2025 को रामपुर तिराहा में आयोजित किए जाने वाले श्रद्धांजलि कार्यक्रम की जिम्मेदारी दी गई। संस्कृति विभाग ने जिस फर्म को टेंट-कनात लगाने की जिम्मेदारी दी, उसने भी शहीद स्थल पर 5400 स्क्वायर फुट का पांडल लगाया और 17260 स्क्वॉयर फीट कारपेट बिछाने का पेमेंट सरकारी खजाने से वसूल लिया।
बेशर्मी की हद पार करते हुए संस्कृति विभाग के अधिकारियों ने फर्म से ये तक नहीं पूछा कि भैया जब टेंट 5400 स्क्वायर फीट का है तो 17 हजार 260 स्क्वायर फीट कारपेट कहां बिछा दी? क्या टेंडर में पूरे मुज्जफरनगर को कवर करने की शर्त थी।लेकिन कोई सवाल नहीं, न लेखा विभाग ने गौर किया न वित्त विभाग ने नजरेइनायत करना मुनासिब समझा और फर्म को पेमेंट कर दिया गया।
किसी ने भी संस्कृति विभाग की उस फाइल पर लाल स्याही नहीं फेरी जिसने फर्म को पेमेंट करने की सिफारिश की या आख्या लिखी। अंधा बांटे रेवड़ी बस अपने को देय वाला खेल जारी रहा और सरकारी खजाना सिसकता रहा।
ऐसे में सवाल उठता है कि संस्कृति विभाग की ये संस्कृति बड़े आयोजनो के जरिए किसकी धरोहर को बचाने का काम कर रही है प्रदेश की या उन फर्मों की जो तिकड़मों के जरिए टेंडर हासिल करते हैं और तिकड़म भिड़ा कर ही सरकारी खजाने पर चूना लगाते हुए भुगतान भी हासिल कर लेते हैं।
उत्तराखंड संस्कृति महकमे का ये किस्सा यही खत्म नहीं होता अभी और अध्याय भी बाकी हैं हम लगातार आपको बताते रहेंगे आप बने रहिएगा समाचार 4 U के साथ सस्क्राइब करना और हमें सच के साथ खड़े रहने का हौसला देते रहना।

