उत्तराखंड के बुग्यालों पर बड़ा संकट: आदि कैलाश क्षेत्र में तेजी से फैल रहा खतरनाक ‘चाइनीज स्टेलेरा’

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उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में एक बेहद खतरनाक और विषैली वनस्पति प्रजाति ‘चाइनीज स्टेलेरा’ बहुत तेजी से फैल रही है। हाल ही में वन विभाग की रिसर्च विंग के शोधकर्ताओं को पिथौरागढ़ के दारमा और व्यास वैली के पास छियालेख बुग्याल के साथ-साथ आदि कैलाश क्षेत्र के आसपास पहली बार इसके फूलों से लदे हुए पौधे मिले हैं, जिसने पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता को काफी बढ़ा दिया है।

मूल रूप से चीन, तिब्बत और मंगोलिया में पाई जाने वाली यह प्रजाति देखने में बेहद खूबसूरत और आकर्षक लगती है, लेकिन असल में यह इतनी ज्यादा विषैली होती है कि इसे खाने से किसी भी मवेशी या इंसान की जान तक जा सकती है; यहाँ तक कि इसके पत्तों को मसलकर सूंघने मात्र से इंसान बेहोश हो सकता है। इससे पहले चमोली जिले के मलारी क्षेत्र और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के आसपास इसके कुछ पौधे मिलने की जानकारी सामने आई थी, लेकिन इस विशेष वैली में इसके फूल वाले पौधों का यह पहला आधिकारिक रिकॉर्ड है, जो राज्य के जैव-विविधता तंत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

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बुग्यालों को पूरी तरह बंजर कर सकता है

पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यह पौधा उत्तराखंड के हरे-भरे हिमालयी बुग्यालों (मखमली घास के मैदानों) के अस्तित्व के लिए अब तक का सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है। यह शातिर वनस्पति अपने आसपास की मिट्टी में कुछ ऐसे विषैले रसायन छोड़ती है, जिससे इसके समीप उगने वाली प्राकृतिक हरी घास और अन्य स्थानीय उपयोगी वनस्पतियां धीरे-धीरे पूरी तरह नष्ट हो जाती हैं।

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इस रासायनिक प्रभाव के कारण जमीन की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति भी बुरी तरह प्रभावित होती है, जिससे सुंदर बुग्याल धीरे-धीरे बंजर भूमि में तब्दील होने लगते हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जहरीला होने के कारण स्थानीय मवेशी भी इसे चारे के रूप में नहीं खा सकते हैं, जिससे पहाड़ों में पशुपालन करने वाले स्थानीय ग्रामीणों और चरवाहों के सामने पशुओं को चराने का एक बहुत गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।

औषधीय गुणों से भी भरपूर है ‘हिमालयन स्टेलेरा’

इस पौधे के अत्यधिक विषैले और नुकसानदेह होने के बावजूद, विज्ञान की दुनिया में इसके कुछ बेहद महत्वपूर्ण और असाधारण औषधीय गुण भी देखे गए हैं। वन अनुसंधान के जीआरएफ मनोज के अनुसार, इस पौधे को ‘हिमालयन स्टेलेरा’ के नाम से भी जाना जाता है और चीन में पारंपरिक रूप से इसका उपयोग कई तरह की जीवन रक्षक दवाएं बनाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है।

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चिकित्सीय शोधों में पाया गया है कि इसके सही और नियंत्रित इस्तेमाल से शरीर की सूजन और पुराने दर्द को काफी हद तक कम किया जा सकता है, साथ ही यह गठिया और जोड़ों के गंभीर दर्द में भी बेहद असरदार साबित होता है। इसके अलावा, त्वचा रोगों, खुजली, फंगल संक्रमण व त्वचा संबंधी अन्य जटिल समस्याओं के इलाज के साथ-साथ इसका उपयोग परजीवी व कीट नियंत्रण और एंटी-कैंसर दवाओं के निर्माण में भी एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में किया जाता है।