केदारनाथ-बदरीनाथ में हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट से वन्यजीवों पर असर,7 साल बाद फिर होगा बड़ा अध्ययन

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केदारनाथ
– बेशक हेली सेवा दुर्गम पहाड़ो मे यात्रा को आसान बना रही हो, चारधाम यात्रा को सुगम बनाकर राज्य सरकार की आमदनी बढ़ाने में योगदान दे रही हो लेकिन हेलीकॉप्टर का शोर और उसके पंखों की हवा जंगल के लिए मुसीबत और वन्य जीवों के लिए मुसीबत का सबब माने जा रहे हैं।

ऐसे में बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के लिए संचालित हो रही हेलीकॉप्टर सेवाओं के शोर से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके व्यवहार पर क्या असर पड़ रहा है इसको लेकर केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग एक बार फिर बड़ा अध्ययन कराने जा रहा है।बताया जा रहा है कि विभाग न सिर्फ वन्यजीवों पर शोर के असर की जांच करेगा, बल्कि ये भी देखेगा कि हेलीकॉप्टर कंपनियां तय मानकों का पालन कर रही हैं या नहीं।

केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य करीब 975 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। पंचकेदार के सभी मंदिर इसी अभयारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। हर साल यात्रा सीजन में केदारनाथ धाम के लिए 15 से अधिक हेलीकॉप्टर कंपनियां दिनभर उड़ानें भरती हैं। बदरीनाथ के लिए भी अलग से सेवाएं चलती हैं।दिनभर आसमान में मंडराते हेलीकॉप्टरों की तेज आवाज से जंगल की शांति भंग होती है। वन विभाग को लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि शोर के कारण हिमालयी मोनाल, कस्तूरी मृग, भालू और अन्य दुर्लभ वन्यजीव विचलित होकर अपने मूल आवास को छोड़कर रिहायशी इलाकों की ओर आ रहे हैं।

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नियमों के अनुसार, सेंचुरी क्षेत्र में किसी भी हेलीकॉप्टर की उड़ान जमीन से कम से कम 600 मीटर की ऊंचाई पर होनी चाहिए, ताकि वन्यजीवों को न्यूनतम परेशानी हो। लेकिन आरोप है कि कई कंपनियां समय बचाने और ज्यादा चक्कर लगाने के लिए कम ऊंचाई पर उड़ान भर रही हैं।

यह पहली बार नहीं है जब इस मुद्दे पर चिंता जताई गई हो। साल 2017 में भी हेलीकॉप्टरों के शोर से वन्यजीवों पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर एक वैज्ञानिक अध्ययन किया गया था। उस अध्ययन में भी चौंकाने वाले परिणाम सामने आए थे।अध्ययन में पाया गया था कि लगातार शोर से:वन्यजीवों के खाने और प्रजनन के समय में बदलाव आ रहा है।कई प्रजातियां अपने परंपरागत कॉरिडोर छोड़ रही हैं।पक्षियों में घोंसला छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है।अब 7 साल बाद स्थिति और बिगड़ने की आशंका है, क्योंकि हेलीकॉप्टरों की संख्या पहले से कई गुना बढ़ गई है।

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इसलिए वन विभाग ने इस बार भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून के साथ अन्य संस्थाओं को भी इस अध्ययन में शामिल करने का फैसला किया है। इस पूरे मामले पर केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ रजत सुमन ने कहा,”सेंचुरी क्षेत्र में हेलीकॉप्टरों की उड़ान से वन्यजीवों के व्यवहार और उनके प्राकृतिक आवास पर पड़ रहे प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा। इसमें उड़ान के निर्धारित मानकों का पालन हो रहा है या नहीं, यह भी देखा जाएगा। जल्द ही अध्ययन शुरू किया जाएगा।”

वहीं अध्ययन शुरू होने से पहले जंगलात महकमे ने सख्त रुख अपनाया है। बीते माह केदारनाथ और बदरीनाथ के लिए सेवा दे रही सभी हेलीकॉप्टर कंपनियों से उनकी नियमित उड़ानों, ऊंचाई और रूट का हिसाब किताब मांगा गया था।हैरानी की बात है कि एक महीने बीत जाने के बाद भी किसी भी कंपनी ने विभाग को डाटा उपलब्ध नहीं कराया है। इसे गंभीरता से लेते हुए केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग अब सभी कंपनियों को कारण बताओ नोटिस भेजने की तैयारी कर रहा है।

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जंगलात महकमे की सख्ती सेना पर भी दिखाई दी। बीते 20 अक्टूबर को मदमहेश्वर घाटी में भारतीय सेना के दो चेतक हेलीकॉप्टर बिना किसी पूर्व अनुमति के उतर गए थे।वन विभाग के रेंजर ने इसकी सूचना डीएफओ को दी। जांच में पता चला कि सेना ने इस संबंध में वन विभाग से कोई अनुमति नहीं ली थी। कुछ देर रुकने के बाद दोनों हेलीकॉप्टर बदरीनाथ की ओर रवाना हो गए।डीएफओ रजत सुमन ने इसे भारतीय वन अधिनियम का उल्लंघन मानते हुए सेना को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में बिना अनुमति हेलीकॉप्टर उतारना गंभीर कानूनी अपराध है। सूत्रों का कहना है कि इससे पहले भी इस क्षेत्र में चीता हेलीकॉप्टरों को रेकी करते देखा गया है।वन विभाग का यह अध्ययन यात्रा और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अगर अध्ययन में मानकों के उल्लंघन और वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव की पुष्टि होती है, तो हेलीकॉप्टर उड़ानों के समय, ऊंचाई और संख्या को लेकर नए सिरे से SOP बनाई जा सकती है।TA