देहरादून। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित एशिया के सबसे प्रसिद्ध और खूबसूरत घास के मैदानों में शुमार ‘बेदनी बुग्याल’ पर इस समय एक बड़ा पारिस्थितिकीय खतरा दस्तक दे रहा है। फॉरेस्ट ट्रेनिंग अकादमी के निदेशक, मुख्य वन संरक्षक और वन अनुसंधान के विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक प्रारंभिक सर्वे में यह बात सामने आई है कि यहाँ जंगली पालक और पॉलीगोनम जैसी बेहद आक्रामक खरपतवार तेजी से घुसपैठ कर रही हैं। विशेषज्ञों की इस संयुक्त टीम द्वारा हालात की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर आगामी कार्रवाई के लिए वन मुख्यालय को भेज दी गई है।
लगभग 3400 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बेदनी बुग्याल अपनी अद्भुत जैव विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस बुग्याल की संरचना में मुख्य रूप से तीन स्तर पाए जाते हैं, जिसमें सबसे ऊपर की ओर घने जंगल (बांज, देवदार, भोजपत्र) हैं, बीच में दानथोनिया घास का मैदान है, जबकि सबसे ऊपरी बर्फीली सीमा पर बेहद दुर्लभ वनस्पतियां और पौधे उगते हैं।
संजीव चतुर्वेदी और अनुसंधान टीम का वैज्ञानिक सर्वे
विभागीय सूत्रों से प्राप्त आधिकारिक विवरण के अनुसार, पिछले माह के तीसरे सप्ताह में फॉरेस्ट ट्रेनिंग अकादमी के निदेशक व मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी और वन अनुसंधान शाखा के अनुसंधान अधिकारी मनोज सिंह ने इस क्षेत्र का एक विस्तृत प्रारंभिक सर्वे किया था। इस वैज्ञानिक सर्वे के बाद निदेशक संजीव चतुर्वेदी ने वन मुख्यालय को पत्र लिखकर इस पूरे मामले की गंभीरता से अवगत कराया है।
वनाधिकारियों के अनुसार, वर्तमान स्थिति में बुग्याल का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मुख्य रूप से दानथोनिया घास से ढका हुआ है। हालांकि, बुग्याल के कुछ विशिष्ट पैच और जगहों पर जंगली पालक, पॉलीगोनम और पॉलीस्टेकियम जैसे हानिकारक खरपतवार काफी तेजी से फैलने लगे हैं, जिससे स्थानीय वनस्पति के अस्तित्व पर संकट आ गया है।
पशुओं के मल से बढ़ रहा नाइट्रोजन है मुख्य कारण
वैज्ञानिक विश्लेषण में इन खरपतवारों के इतनी तेजी से बढ़ने का एक मुख्य कारण मिट्टी में नाइट्रोजन की बढ़ती मात्रा को माना गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, बुग्याल के इस हिस्से में जो भी पशु चरने के लिए पहुँचते हैं, उन पशुओं के मल में प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन मौजूद होता है।
ऐसे में पशुओं के मल-मूत्र से मिलने वाले नाइट्रोजन के कारण ये अनचाहे खरपतवार बहुत तेजी से अपनी जड़ें जमाते हैं। इसके अलावा बुग्याल को मिट्टी के कटाव से भी एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिससे कई जगहों पर संरक्षण का कार्य तत्काल किए जाने की जरूरत है।
भू-कटाव को रोकने के लिए विभाग द्वारा बुग्याल में जो जूट की मैटिंग लगाई जा रही है, उस जूट मैटिंग के ऊपर तुरंत स्थानीय घास को लगाया जाना बेहद आवश्यक है। इससे वहाँ पर खरपतवार अपना स्थान नहीं बना सकेंगे और मिट्टी की पकड़ मजबूत बनी रहेगी।
16 औषधीय प्रजातियों में से 13 गंभीर खतरे में
वन अनुसंधान अधिकारी मनोज सिंह ने बताया कि बेदनी बुग्याल जैव विविधता की दृष्टि से बेहद समृद्ध है और यहाँ सर्वे के दौरान 16 औषधीय व सुगंधित प्रजाति के बहुमूल्य पौधे मिले हैं। चिंता की बात यह है कि इन 16 प्रजातियों में से 13 प्रजातियाँ इस समय खरपतवार की घुसपैठ के कारण गंभीर खतरे में हैं।
खरपतवार नियंत्रण के लिए अधिकारियों ने खरपतवार वाले छोटे-छोटे इलाकों को सबसे पहले GPS तकनीक से चिह्नित करने, खरपतवार की जड़ों को पूरी तरह से खोदकर वहाँ से समूल नष्ट करने साफ की गई जगहों पर तुरंत स्थानीय प्रजाति की घास लगाए जाने जैसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सुझाव दिए हैं।
रोटेशनल चराई और कैंपिंग पर सख्त नियम की सिफारिश
बुग्याल को बचाने के लिए चराई प्रबंधन और पर्यटन को लेकर भी बेहद सख्त नियम लागू करने की सिफारिश की गई है। इसके तहत बुग्याल में होने वाली चराई पर कड़ा नियंत्रण रखते हुए पशुओं की संख्या की एक निश्चित सीमा तय होनी चाहिए और घुमावदार चराई यानी रोटेशनल चराई लागू की जानी चाहिए। साथ ही, दुर्लभ पौधों वाले इलाकों को पूरी तरह से चराई-मुक्त बनाया जाना चाहिए।
पर्यटकों के रहने और कैंपिंग के लिए बुग्याल में एक विशेष जगह पहले से तय की जानी चाहिए। इसके साथ ही, फूल खिलने के मुख्य मौसम यानी जून से अगस्त के महीनों में विभाग को सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। बुग्याल के भीतर आवागमन केवल एक निश्चित रास्ते से ही होना चाहिए, क्योंकि हर कहीं चलने से भूशरण (मिट्टी के क्षरण) का खतरा बढ़ता है।
प्रबंधन को चाहिए कि वे बुग्याल के मुख्य रास्तों को मजबूत बनाएं ताकि सैलानियों के पैर पूरे मैदान पर हर कहीं न पड़ें। इसके साथ ही नियमित निगरानी की जाए और हर साल अनिवार्य रूप से वैज्ञानिक सर्वे किया जाए। इस पूरे पारिस्थितिकीय संकट और उसके वैज्ञानिक समाधान की यह रिपोर्ट वन मुख्यालय को समय पर कार्रवाई के लिए अग्रसारित कर दी गई है।

