उत्तराखंड में अमानक मदरसों पर कड़ा फैसला: लाइब्रेरी और साइंस लैब होना जरूरी, नहीं तो लगेगा ताला

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देहरादून। उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड के खत्म होने और 1 जुलाई से अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अस्तित्व में आने के बाद एक बहुत बड़ा नीतिगत फैसला लिया गया है। अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह पांधी ने स्पष्ट किया है कि जो मदरसे तय मानकों को पूरा नहीं करेंगे, उन्हें तीन महीने के बाद पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। इस कड़े फैसले का सीधा असर राज्य में बिना उचित बुनियादी ढांचे के एक-दो कमरों में चल रहे अमानक मदरसों की व्यवस्था पर पड़ेगा।

अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने सूबे में अल्पसंख्यक संस्थानों के आधुनिकीकरण और सुधार के लिए अपनी आगे की पूरी रूपरेखा तैयार कर ली है। प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह पांधी ने एक विशेष बातचीत के दौरान कहा कि आगामी तीन महीने तक विभाग का रवैया पूरी तरह सहयोगात्मक रहेगा, ताकि सभी संस्थान नियमों को समझ सकें। इसके बाद भी जो मदरसे मान्यता नहीं लेंगे या नियमों की अनदेखी करेंगे, उन्हें प्राधिकरण बंद करा देगा।

प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. गांधी ने यह साफ किया है कि उनका उद्देश्य किसी भी मदरसे को जानबूझकर या दुर्भावना से बंद करना बिल्कुल नहीं है। मकसद सिर्फ इतना है कि सभी अल्पसंख्यक संस्थान आगे आएं और इस नई व्यवस्था का हिस्सा बनकर अपने बच्चों को धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक शिक्षा से भी पूरी तरह जोड़ें।

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पहले ही दिन 9 संस्थानों को मिली मान्यता

प्राधिकरण ने अपने गठन के पहले ही दिन यानी 1 जुलाई को त्वरित कार्रवाई करते हुए सात मदरसों सहित कुल नौ अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को विधिवत मान्यता प्रदान की थी। इस समय बड़ी संख्या में अन्य मदरसों के आवेदन भी पाइपलाइन में हैं, जो जल्द ही सभी औपचारिकताएं पूरी कर प्राधिकरण का हिस्सा बनने वाले हैं।

मदरसों के बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें डॉक्टर-इंजीनियर बनाने की योजना को लेकर भी संबद्धता के मानकों को कड़ा किया गया है। प्राधिकरण के अध्यक्ष ने पुरानी व्यवस्था पर बात करते हुए कहा कि पूर्ववर्ती मदरसा बोर्ड में इस प्रकार के आधुनिक मानक मौजूद नहीं थे।

अब नई व्यवस्था लागू होने के बाद जब मदरसे इन सभी आधुनिक मानकों को पूरा करेंगे, तभी वे प्राधिकरण के पास अंतिम मान्यता के लिए आवेदन कर सकेंगे। इससे बच्चों का सर्वांगीण विकास होगा और वे संकीर्णता के दायरे से बाहर निकल सकेंगे।

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सिलेबस में शामिल हुए AI, एथिक्स और क्यूआर कोड

इस नए पाठ्यक्रम में केवल किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि व्यावहारिक और नैतिक मूल्यों को भी विशेष स्थान दिया गया है। प्राधिकरण ने मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी सहित हर अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं के हिसाब से अलग-अलग विशिष्ट सिलेबस तैयार किया है।

इस बेहद संवेदनशील काम में विशेषज्ञों और धर्मगुरुओं से व्यापक विचार-विमर्श करने के बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लेकर एथिक्स (नैतिकता) तक के विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चे अपने-अलग धर्म के अनुसार यहां वुजू, नमाज से लेकर लंगर और समाज सेवा तक के सभी व्यावहारिक पहलू सीख सकेंगे।

तकनीक का लाभ देने के लिए इस नए कोर्स में विशेष क्यूआर कोड (QR Code) की व्यवस्था भी की गई है, जिसे मोबाइल से स्कैन करके छात्र सीधे वीडियो फॉर्मेट में अपनी पढ़ाई और अभ्यास को देख व समझ सकेंगे।

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विरोध पर बोले- सीएम धामी का विजन सर सैयद जैसा दूरदर्शी

मदरसा बोर्ड को खत्म करने और अल्पसंख्यक प्राधिकरण बनाने को लेकर हो रहे विरोध के सवाल पर डॉ. सुरजीत सिंह ने इतिहास का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि जब सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी, तब भी उनका सबसे ज्यादा विरोध करने वाले उनके अपने ही समाज के लोग थे। देश की आजादी से पहले सर सैयद अहमद खान ने जो भविष्य का विजन देखा था, वह बेहद एडवांस था।

उसी तर्ज पर वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का विजन भी बहुत अलग और दूरदर्शी है, जिसके सकारात्मक परिणाम आने वाले 10 वर्षों में राज्य के सामने नजर आएंगे। डॉ. पांधी ने दावा किया कि उत्तराखंड ने प्राधिकरण का गठन कर एक ऐसा ऐतिहासिक कदम उठाया है जिसके बारे में दूसरे राज्य अभी सोच भी नहीं पा रहे हैं, और भविष्य में देश के दूसरे सूबे भी इस मॉडल को अपनाने के लिए आगे आएंगे।

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