उत्तराखंड में साक्षर महिलाएं चुन रहीं छोटा परिवार; शहरों में तेजी से सिमटा कुनबा, देखें आंकड़े

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देहरादून। उत्तराखंड में साक्षरता के ग्राफ के साथ ही अब सामाजिक बदलाव की एक नई तस्वीर सामने आ रही है। राज्य की पढ़ी-लिखी और साक्षर महिलाएं अब तेजी से छोटे परिवार को प्राथमिकता दे रही हैं। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में परिवारों का आकार लगातार छोटा होता जा रहा है। देहरादून से वरिष्ठ संवाददाता चांद मोहम्मद की इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञ इसके पीछे शिक्षा, रोजगार और शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी को मुख्य वजह मान रहे हैं।

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्ट में शिक्षा के स्तर और महिलाओं की प्रजनन दर के बीच एक बेहद चौंकाने वाला और स्पष्ट अंतर सामने आया है। आंकड़ों के अनुसार, राज्य में अशिक्षित महिलाओं की कुल प्रजनन दर जहां 3.2 है, वहीं ग्रेजुएट या उससे अधिक शिक्षित महिलाओं में यह आंकड़ा गिरकर ठीक आधा यानी महज 1.6 रह गया है।

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आंकड़ों का यह गणित साफ करता है कि राज्य में प्रति 100 अशिक्षित महिलाएं औसतन 320 बच्चों को जन्म दे रही हैं। इसके ठीक विपरीत, प्रति 100 ग्रेजुएट या उच्च शिक्षित महिलाओं पर बच्चों को जन्म देने की यह संख्या केवल 160 है। इस प्रकार अशिक्षित महिलाओं में प्रजनन दर, साक्षर और उच्च शिक्षित महिलाओं की तुलना में लगभग दोगुनी बनी हुई है।

अगर पूरे प्रदेश के जनसांख्यिकीय ढांचे पर नजर डालें, तो उत्तराखंड की कुल प्रजनन दर 1.7 दर्ज की गई है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत (1.9) से भी काफी कम है। भौगोलिक विषमताओं के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर जहां 1.8 है, वहीं प्रदेश के शहरी इलाकों में सिमटते परिवारों के बीच यह आंकड़ा महज 1.5 पर आ चुका है।

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इस सामाजिक बदलाव की बुनियाद को समझने के लिए राज्य में महिलाओं की साक्षरता दर को देखना जरूरी है, जो अब 94.6% के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। प्रदेश में केवल 5.4% महिलाएं ही ऐसी हैं जो अशिक्षित हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 2.5% महिलाओं ने भले ही औपचारिक शिक्षा नहीं ली, पर वे साक्षर हैं। इसके अलावा 2.9% प्राइमरी से नीचे, 9.4% प्राइमरी, 16.8% मिडिल, 18.9% हाईस्कूल, 24.2% इंटर और 19.9% महिलाएं ग्रेजुएट या उससे अधिक शिक्षित हैं।

इस बड़े बदलाव पर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. जया नवानी का कहना है कि महिलाओं में बढ़ती शिक्षा, रोजगार की उपलब्धता और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनकी सोच का दायरा बदला है। इसके साथ ही अब परिवार नियोजन सेवाओं तक उनकी बेहतर और आसान पहुंच सुनिश्चित हुई है, जिससे उनके प्रजनन व्यवहार और प्राथमिकताओं में यह बड़ा सुधार दिखाई दे रहा है।

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वहीं दूसरी ओर, कामकाजी दंपतियों की बदलती लाइफस्टाइल पर बात करते हुए डॉ. निशा सिंगला ने बताया कि समाज में कामकाजी जोड़ों की बढ़ती संख्या इस बदलाव की सबसे बड़ी धुरी है। शहरों में एकल परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति और सीमित परिवार को बेहतर परवरिश देने की सोच ही महिलाओं को छोटे परिवारों की ओर आकर्षित कर रही है।

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