देहरादून। उत्तराखंड अल्पसंख्यक प्राधिकरण ने मदरसों की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव करते हुए नया सिलेबस तैयार कर लिया है। इस नए पाठ्यक्रम के लागू होने से अल्पसंख्यक समाज के बच्चों की शिक्षा की सूरत पूरी तरह बदलने की उम्मीद है। इस नीतिगत फैसले का सीधा असर मदरसों में पढ़ रहे मुस्लिम समुदाय के छात्र-छात्राओं पर पड़ेगा, जो अब आधुनिक चुनौतियों के लिए तैयार हो सकेंगे।
अल्पसंख्यक प्राधिकरण द्वारा तैयार किए गए इस नए पाठ्यक्रम में धर्म के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक शिक्षा को बहुत ही गहराई से जोड़ने का प्रयास किया गया है। इस बदलाव के तहत मदरसों के छात्र अब सोशल मीडिया के इस दौर में न सिर्फ ‘डिजिटल नैतिकता’ सीखेंगे, बल्कि अपने जीवन में ‘शुक्र की डायरी’ लिखने की एक नई आदत भी विकसित करेंगे।
प्राधिकरण की ओर से जारी आधिकारिक विवरण के मुताबिक, केवल मुस्लिम ही नहीं, बल्कि संपूर्ण अल्पसंख्यक समाज के बच्चों के लिए अलग-अलग विशिष्ट पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। मुस्लिम समाज के लिए जो पाठ्यक्रम सामने आया है, उसमें व्यावहारिक ज्ञान और गणितीय कौशल को मजबूत करने पर सबसे अधिक जोर है।
गणित में जकात और कक्षा 4 में ‘शुक्र की डायरी’
इस नए सिलेबस की सबसे खास बात यह है कि इस्लाम धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले ‘जकात’ (दान) का पूरा हिसाब-किताब अब कक्षा 5वीं के गणित की किताब में शामिल कर दिया गया है। प्राधिकरण ने कक्षा 5 और कक्षा 8 के पाठ्यक्रम में जकात के नियम और उसकी गणना को गणित के ‘प्रतिशत’ वाले अध्याय से पूरी तरह जोड़ दिया है। इससे बच्चों का व्यावहारिक गणित मजबूत होगा।
इसके साथ ही, कक्षा चार के छात्रों के भीतर ‘कृतज्ञता’ यानी आभार की भावना को विकसित करने के लिए ‘शुक्र की डायरी’ लिखने की एक विशेष पहल शुरू की जाएगी। इस डायरी के माध्यम से बच्चे हर दिन उन तमाम चीजों और बातों का लिखित जिक्र करेंगे, जिनके लिए वे ईश्वर और समाज के प्रति आभारी हैं।
एनिमेटेड वीडियो और वुजू गीत से व्यावहारिक अभ्यास
प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी ने नए बदलावों की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया है कि शुरुआती स्तर पर बच्चों की पढ़ाई को बोझिल नहीं बनाया जाएगा। कक्षा एक और दो के छोटे बच्चों को डराने वाली किताबी पढ़ाई कराने के बजाय, अब कठपुतलियों और रोल प्ले के रचनात्मक माध्यमों से बुनियादी नैतिकता सिखाई जाएगी।
इसके साथ ही बच्चों को इस्लाम में ‘वुजू’ करने का सही तरीका और नमाज के अरकान सिखाने के लिए अब केवल किताबी ज्ञान का सहारा नहीं लिया जाएगा। मदरसों के छात्र अब डिजिटल तकनीक की मदद से तैयार किए गए विशेष एनिमेटेड वीडियो और ‘वुजू गीत’ के जरिए इसका व्यावहारिक अभ्यास करना सीखेंगे।
स्क्रीन टाइम और हज का वर्चुअल सफर
नए पाठ्यक्रम में आधुनिक तकनीक और जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं का समाधान भी शामिल किया गया है। इसी क्रम में कक्षा सात के छात्रों के लिए ‘डिजिटल नैतिकता’ को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जहां वे सोशल मीडिया के मंचों पर हमेशा सच बोलने और इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग पर चर्चा करेंगे। साथ ही, बच्चों को बढ़ते इंटरनेट एडिक्शन से बचाने के लिए एक विशेष ‘स्क्रीन टाइम की डायरी’ बनाने की चुनौती दी जाएगी।
तकनीक का बेहतरीन उपयोग करते हुए अब मदरसों के छात्र 360-डिग्री यूट्यूब वीडियो तकनीक के जरिए घर बैठे ही ‘हज के पवित्र सफर’ का एक सजीव और शानदार आभासी अनुभव प्राप्त कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त, कक्षा छह के छात्रों को ‘मदीना के संविधान’ का विशेष रूप से अध्ययन कराया जाएगा, जिससे वे समझ सकें कि वह आज के आधुनिक युग में कितना प्रासंगिक है।
पाठ्यक्रम में संवैधानिक शिक्षा पर विशेष जोर
अल्पसंख्यक प्राधिकरण ने इस पाठ्यक्रम में केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक शिक्षा पर भी सबसे अधिक जोर दिया है। इसके तहत कक्षा आठ के छात्रों के लिए भारतीय संविधान के सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद 25-28 और अनुच्छेद 30 का अध्ययन अनिवार्य किया गया है।
इन संवैधानिक विषयों पर मदरसों में नियमित रूप से वाद-विवाद प्रतियोगिताएं भी आयोजित कराई जाएंगी। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि छात्र अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग हो सकें और समाज की मुख्यधारा से मजबूती के साथ जुड़ सकें।

