कुछ अफसर कहते नहीं कर के दिखाते हैं…बेशक ये मुट्ठी भर ही हों लेकिन यही वो अफसर है जो जनता के बीच मिसाल बनते हैं..उन्ही में से एक है उत्तराखंड के सूचना महानिदेशक बंशीधर तिवारी..जिन्होने पीएम मोदी और सीएम धामी की ईधन बचाने की अपील पर अमल किया है । बंशीधर तिवारी सिर्फ सूचना महानिदेशक नहीं,बल्कि अपर सचिव मुख्यमंत्री भी हैं।
बावजूद इसके उन्होने बेझिझक साईकिल को सफर का साथी बना लिया। मई के गर्म महीने में साईकिल से दफ्तर आने में गुरेज नहीं किया। दरअसल शनिवार को नो व्हीकल डे की गुजारिश की गई थी। लेकिन घर से दफ्तर दूर है ऐसे में सूचना महानिदेशक ने साईकिल से सफर करना मुनासिब समझा ताकि. ताकि ईधन भी बचे पर्यावरण भी महफूज रहे, सेहत भी फीट रहे और वक्त पर दफ्तर भी पहुंचा जा सके।
सीनियर होने के नाते बंशीधर तिवारी सिर्फ सूचना महानिदेशक ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के अपर सचिव भी हैं और एमडीडीए के उपाध्यक्ष भी हैं। उनके सारे दफ्तर उनके आवास से काफी दूर हैं। घर सहस्त्रधारा रोड पर है जबकि सूचना निदेशालय रिंग रोड पर और मुख्यमंत्री आवास गढी कैंट तो सचिवालय राजपुर रोड़ एमडीडीए शहर के दूसरे कोने पर बावजूद इसके सूचना महानिदेशक ने साईकिल को अपनाया, ये जानकर भी कि उनके हर दफ्तर शहर के अलग-अलग कोनो पर।
बहरहाल उनकी इस मुहिम की जितनी तारीफ की जाए वो कम ही है क्योंकि ये सिर्फ दफ्तर पहुंचने का तरीका भर नहीं था, बल्कि कुदरत का ख्याल रखने का संदेश भी है और ईधन बचाने की काबिलेतारीफ पहल भी।सूचना महानिदेश बंशीधर तिवारी ने साईकिल चला कर आगाज किया है ताकि उनके मातहत सार्वजनिक परिवहन, कार पूलिंग और साइकिल जैसे ईधन विहीन विकल्प अपनाने में हिचके नहीं।
वहीं एमडीडीए में भी उनकी अगवाई में “ईधन बचाओ मुहिम”भी शुरू की गई है। जिसके तहत ईंधन से लेकर बिजली बचाने की पहल की जा रही है ताकि उत्तराखंड ही नहीं देश भी मजबूत हो सके। पर्यावरण से भी और आर्थिक रूप से भी।
देखा जाए तो तेजी से फैलते देहरादून शहर में, अब ट्रैफिक और प्रदूषण सुरसा के मुंह सा बन चुके हैं। ऐसे में एक वरिष्ठ अधिकारी का यह कदम सिर्फ पहल ही नहीं बल्कि समाज के लिए प्रेरणा भी है। जैसे छोटी-छोटी बचत ही बड़ी रकम की बनती है वैसे ही पहली कोशिश का कदम बेशक छोटा होता है लेकिन वही बड़े बदलाव की मजबूत बुनियाद बनता है।
ऐसे में कहा जा सकता है कि बंशीधर तिवारी की यह पहल आने वाले कल में मील का पत्थर साबित होगी। क्योंकि तिवारी जैसे अफसर फरमान नहीं सुनाते बल्कि बदलाव के लिए खुद पहल कर. मिसाल बनते हैं।

