एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में भारत के पर्यावरणीय हालात को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर साल लगभग 1.56 करोड़ मीट्रिक टन खतरनाक औद्योगिक कचरा निकल रहा है, जो मिट्टी, पानी और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गया है। चिंता की बात यह है कि आधिकारिक रिकॉर्ड में केवल 200 के करीब ही प्रदूषित स्थल दर्ज हैं, जबकि वास्तविकता में ऐसे जहरीले इलाकों की संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है जिनकी अभी तक पहचान भी नहीं हो पाई है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के इस शोध ने भारत में प्रदूषण निगरानी और कचरा प्रबंधन की लचर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पहचान से बाहर सैकड़ों प्रदूषित स्थल
अध्ययन के मुताबिक, भारत में प्रदूषण स्थलों की पहचान और उनके दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया बहुत धीमी है। तुलना के लिए स्विट्जरलैंड जैसे छोटे देश का उदाहरण दिया गया है, जहाँ औद्योगिक गतिविधियाँ कम होने के बावजूद भारत से अधिक प्रदूषित स्थल दर्ज हैं। इसका मतलब है कि भारत में एक बड़ी संख्या में ऐसे इलाके मौजूद हैं जो जहरीले रसायनों से भरे हुए हैं, लेकिन सरकारी फाइलों में उनका कोई जिक्र नहीं है। नियमित निगरानी की कमी के कारण ये स्थल भविष्य में बड़ी स्वास्थ्य आपदा का कारण बन सकते हैं।
नीतियों का बिखराव और बढ़ती चुनौतियां
शोधकर्ताओं ने पाया है कि भारत में प्रदूषित भूमि और कचरा निपटान से संबंधित नीतियां अलग-अलग विभागों में बंटी हुई हैं। कहीं केवल मिट्टी की गुणवत्ता देखी जाती है, तो कहीं भूजल की निगरानी होती है। इस बिखरी हुई व्यवस्था के कारण प्रदूषण की पूरी तस्वीर साफ नहीं हो पाती। उद्योगों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले सीसा, पारा और कैडमियम जैसे भारी तत्व मिट्टी और पानी के जरिए शरीर में पहुँच रहे हैं, जो लंबे समय में वन्यजीवों और इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
नियमित निगरानी और कानूनी जवाबदेही की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की तर्ज पर भारत को भी एक मजबूत तंत्र विकसित करना होगा। इसमें वैज्ञानिक डेटा के आधार पर प्रदूषित क्षेत्रों की पहचान, उनकी नियमित निगरानी और कचरा फैलाने वाली इकाइयों की कानूनी जवाबदेही तय करना अनिवार्य है। जब तक प्रदूषण प्रबंधन के लिए एक एकीकृत और सख्त मॉडल नहीं अपनाया जाएगा, तब तक मिट्टी और पानी को जहरीला होने से रोकना मुश्किल होगा।

