देश में इस साल गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन और उम्मीद से कहीं ज्यादा हुई सरकारी खरीद ने मंडियों का पूरा समीकरण बदल कर रख दिया है। रबी विपणन सत्र 2026-27 में सरकार की गेहूं खरीद तय लक्ष्य और पिछले वर्ष के तीन करोड़ टन के स्तर, दोनों को पार करते हुए 17 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 3.5 करोड़ टन से अधिक हो चुकी है।
एक तरफ जहां बंपर आवक के कारण सरकारी गोदाम गेहूं से पूरी तरह पट चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ मंडियों में व्यापारियों की कमजोर दिलचस्पी की वजह से गेहूं की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि खुली मंडियों में भाव टूटने से किसानों की नकद कमाई सीधे तौर पर प्रभावित होगी, जिससे पहले से ही सुस्त चल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव और ज्यादा बढ़ सकता है।
फसल वर्ष 2025-26 में देश के भीतर गेहूं का कुल उत्पादन बढ़कर 12.06 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले साल के 11.79 करोड़ टन से काफी अधिक है। इसी बंपर पैदावार के दम पर सरकार का गेहूं स्टॉक पिछले साल के 356.72 लाख टन से छलांग लगाकर अब 427.98 लाख टन हो गया है, जिससे केंद्रीय पूल में स्टॉक 5.13 करोड़ टन के बेहद मजबूत स्तर पर आ चुका है।
यह जुलाई महीने के अनिवार्य बफर मानक 2.75 करोड़ टन की तुलना में बहुत ज्यादा है। राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब में 121.63 लाख टन, मध्य प्रदेश में 104.36 लाख टन, हरियाणा में 81.20 लाख टन, राजस्थान में 24.31 लाख टन और उत्तर प्रदेश में रिकॉर्ड 67.9% की बढ़ोतरी के साथ 17.20 लाख टन गेहूं की खरीदारी सरकारी स्तर पर की गई है।
इस साल कटाई के समय मार्च-अप्रैल के महीनों में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के कारण गेहूं की चमक और दानों की गुणवत्ता को काफी नुकसान पहुंचा था। इसी खराब गुणवत्ता के चलते निजी मिलर्स और बड़े व्यापारी महंगे दामों पर गेहूं खरीदने के इच्छुक नजर नहीं आ रहे हैं।
इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है और पिछले एक महीने के भीतर दिल्ली, कानपुर, इंदौर और राजकोट जैसी देश की प्रमुख मंडियों में गेहूं की कीमतों में करीब 2.5 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है। मसलन, दिल्ली में जो भाव 5 मई को 2,716 रुपये प्रति क्विंटल था, वह 3 जून को गिरकर 2,680 रुपये पर आ गया है, जबकि इंदौर में यह 2,543 रुपये से टूटकर 2,495 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है।
एग्रोकॉर्प इंटरनेशनल के रिसर्च हेड इंद्रजीत पॉल के मुताबिक, कम अवधि में गेहूं के भाव एक सीमित दायरे में ही बने रहेंगे क्योंकि कीमतों में बड़ी तेजी की एकमात्र उम्मीद निर्यात से है, लेकिन रूस और यूक्रेन के मुकाबले भारतीय गेहूं अभी महंगा होने के कारण बड़े निर्यात की संभावनाएं बेहद कम हैं।
सरकारी खरीद और दाम गिरने का सीधा असर ग्रामीण मांग पर दिखाई देगा, क्योंकि किसानों को इस बार निजी व्यापारियों से वह ऊंची कीमत नहीं मिल पा रही है जो पिछले वर्षों में मिली थी। किसानों की जेब में कम पैसा पहुंचने के कारण ग्रामीण इलाकों के बाजारों में सुस्ती और गहरा सकती है, जिसका सीधा और नकारात्मक असर रोजमर्रा के सामानों के साथ-साथ ट्रैक्टर और टू-व्हीलर जैसी बड़ी गाड़ियों की बिक्री पर पड़ने की पूरी आशंका है।

