उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में गहराया जल संकट,12 हजार पारंपरिक स्रोत हुए सूखे

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उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में भू-जल स्तर में प्रतिवर्ष हो रही 20 से 50 सेंटीमीटर की गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है। उत्तराखंड जल संस्थान के प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट के राज्य समन्वयक प्रो. प्रशांत सिंह ने जानकारी दी है कि पिछले 10 से 15 वर्षों में कई मैदानी ब्लॉकों में जलस्तर आठ मीटर तक नीचे चला गया है। इस जल संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिक जल प्रबंधन को बेहद जरूरी बताते हुए उन्होंने देहरादून और हल्द्वानी जैसे तेजी से विकसित होते शहरों में ‘रूफटॉप रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ को अनिवार्य रूप से लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया है। राज्य के लगभग 12 हजार पारंपरिक जल स्रोत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या केवल मौसमी बनकर रह गए हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।

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औद्योगिक और तराई क्षेत्रों में जल संरक्षण के प्रयास

हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे औद्योगिक जिलों में जलस्तर गिरने की रफ्तार 0.5 मीटर प्रति वर्ष से भी अधिक है, जिसे रोकने के लिए सरकार विभिन्न कदम उठा रही है। तराई क्षेत्रों में पानी की खपत को 40 से 50 प्रतिशत तक कम करने के उद्देश्य से ड्रिप इरिगेशन यानी टपक सिंचाई प्रणाली को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही, छोटी नदियों पर चेक डैम बनाकर जल संरक्षण करने और भू-जल के व्यावसायिक उपयोग के लिए कड़े नियम लागू किए गए हैं। विशेष रूप से देहरादून की रिस्पना और बिंदाल जैसी नदियों को पुनर्जीवित करने के प्रयास भी इस योजना का हिस्सा हैं।

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भगवानपुर ब्लॉक की नाजुक स्थिति और अर्ध-संकटग्रस्त श्रेणी

हरिद्वार जिले के भगवानपुर ब्लॉक की स्थिति काफी चिंताजनक होने के कारण इसे ‘अर्ध-संकटग्रस्त’ श्रेणी में रखा गया है। यहाँ पानी का दोहन उसकी प्राकृतिक रूप से रिचार्ज होने की क्षमता से कहीं अधिक हो चुका है, जिसके परिणाम स्वरूप भू-जल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। काशीपुर, किच्छा और रुड़की जैसे शहरों में भी जलस्तर की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिसके लिए तत्काल प्रभावी जल प्रबंधन और जनभागीदारी की आवश्यकता है।

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