देहरादून से अमित शर्मा की इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार, जब भी चाय का जिक्र होता है तो आमतौर पर लोगों के जेहन में असम या दार्जिलिंग का नाम आता है, लेकिन अब उत्तराखंड भी चाय की दुनिया में तेजी से अपनी एक मजबूत और अलग पहचान दर्ज करा रहा है। वर्तमान में राज्य के 13 जिलों में से 9 पर्वतीय जिलों में चाय का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है, जहाँ प्रति वर्ष 1500 हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग सात लाख किलोग्राम हरी पत्तियों का उत्पादन होता है जिससे करीब 1.5 लाख किलो पीने योग्य बेहतरीन चाय तैयार की जा रही है।
उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के माध्यम से संचालित इस पूरी कवायद के तहत अब प्रति वर्ष उत्पादन का लक्ष्य बढ़ाकर 8.5 लाख किलो हरी पत्तियां करने की योजना है, जिससे राज्य के राजस्व में भारी बढ़ोतरी होगी। उत्तराखंड में पैदा होने वाली इस चाय की लाजवाब ताजगी और उच्च गुणवत्ता के कारण यह धीरे-धीरे लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो रही है, जिसे देखते हुए बोर्ड अब राज्य में ‘टी टूरिज्म’ यानी चाय पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी विशेष काम कर रहा है ताकि ग्रामीण आर्थिकी को एक नया पंख मिल सके।
किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम
चाय की यह खेती उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो रही है, जिससे वर्तमान में राज्य के करीब चार हजार स्थानीय परिवार सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं और इसके माध्यम से प्रति वर्ष लगभग सात लाख मानव दिवस रोजगार का सृजन हो रहा है। इस पूरी रोजगार प्रक्रिया का सबसे खूबसूरत और बड़ा हिस्सा स्थानीय ग्रामीण महिलाओं का है, जो खेतों को तैयार करने से लेकर चाय की कोमल पत्तियों को चुनने तक का सारा जिम्मा संभालती हैं।
बोर्ड की नीतियों के तहत किसान अपनी भूमि को 15 वर्षों के लिए चाय विकास बोर्ड को लीज पर दे देते हैं और बाद में खुद ही उसमें मजदूरी करके दोहरा आर्थिक लाभ कमाते हैं; इसके साथ ही बोर्ड किसानों को स्वयं स्वतंत्र रूप से चाय उत्पादन करने के लिए भी लगातार प्रोत्साहित कर रहा है, जिसके तहत निजी स्तर पर चाय उगाने वाले किसानों से बोर्ड उनकी हरी पत्तियां 40 रुपये प्रति किलो की तय दर से खुद खरीदता है। किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ देने के उद्देश्य से बोर्ड ने श्यामखेत, हरी नगरी, कौसानी, चम्पावत और भटौली में हरी पत्तियों को प्रोसेस कर पीने योग्य चाय बनाने के लिए पांच अत्याधुनिक फैक्ट्रियां भी स्थापित कर दी हैं।
बोर्ड को घाटे से उबारना और विपणन की बड़ी चुनौती
उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के सामने वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती इस पूरे व्यवसाय को घाटे से उबारने और स्थानीय स्तर पर चाय की कम खपत की समस्या से निपटने की है, क्योंकि वर्तमान में इस व्यापार में श्रमिकों का भुगतान एक बहुत बड़ी लागत के रूप में सामने आता है जिससे निपटने के लिए अब सरकार की सहायता से चाय बागानों के काम को मनरेगा योजना से जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है।
राज्य में पैदा होने वाली इस चाय की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए स्थानीय होटलों के माध्यम से पर्यटकों को इसका स्वाद चखाया जा रहा है, जबकि उत्पादित कुल चाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा कोलकाता की थोक चाय मंडी में भेजा जाता है जहाँ इसे देश-विदेश के बड़े खरीदार मिलते हैं। अधिकारी मानते हैं कि यदि स्थानीय स्तर पर ही बड़ी चाय वितरक कंपनियां इस उच्च गुणवत्ता वाली चाय को सीधे खरीदकर अपने ब्रांड नाम से पैकेजिंग करके बेचना शुरू कर दें, तो इससे न केवल बोर्ड का घाटा कम होगा बल्कि किसानों की व्यक्तिगत समृद्धि के नए रास्ते भी खुलेंगे।
जैविक चाय ने खींचा वैश्विक बाजारों का ध्यान
केमिकल और रासायनिक खादों से होने वाले नुकसान के प्रति बढ़ती वैश्विक जागरूकता के बीच उत्तराखंड की जैविक चाय ने पूरी दुनिया के चाय प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर मजबूती से खींचा है। राज्य में चाय की खेती को पूरी तरह से जैविक और ऑर्गेनिक मानकों के आधार पर ही आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसके तहत वर्तमान में लगभग 450 हेक्टेयर क्षेत्र में विशुद्ध रूप से जैविक चाय का उत्पादन किया जा रहा है और इस रकबे को लगातार बढ़ाने के प्रयास जारी हैं।
बाजार में ग्रीन टी का बढ़ता हुआ प्रचलन स्थानीय किसानों के लिए एक बेहतरीन और मुनाफेदार अवसर लेकर आया है क्योंकि इस जैविक पद्धति से तैयार होने वाली ब्लैक और ग्रीन टी को पारंपरिक चाय की तुलना में थोक बाजारों में बहुत अच्छे दाम और बड़े अंतरराष्ट्रीय खरीदार मिल रहे हैं, जो उत्तराखंड को वैश्विक पटल पर एक नई पहचान दे रहा है।

