उत्तराखंड में वनकर्मियों को जनगणना के कार्य में लगाए जाने के फैसले पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने कड़ा रुख अपनाते हुए प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक से जवाब तलब किया है। इस मामले की जानकारी तब सार्वजनिक हुई जब न्याय मित्र अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने वन संरक्षण और पर्यावरणीय क्षति से जुड़े एक पुराने मामले की सुनवाई के दौरान इस संवेदनशील मुद्दे को एनजीटी की प्रधान पीठ के सामने उठाया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि एक तरफ जहाँ राज्य के जंगलों में आग लगने की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वनकर्मियों को जनगणना जैसे गैर-वानिकी कार्यों में झोंकना पूरी तरह से गलत है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने आगामी 26 मई को अगली सुनवाई तय की है, जिसमें उत्तराखंड के पीसीसीएफ को अपना आधिकारिक जवाब दाखिल करना होगा।
मूल प्रकरण और पर्यावरणीय क्षति की जांच के आदेश
यह पूरा विवाद दरअसल ऋषिकेश-देहरादून सड़क पर स्थित बड़कोट वन रेंज से शुरू हुआ था, जहाँ वन अधिकारियों द्वारा सूखी पत्तियों को जलाने के गंभीर आरोप लगे थे। इन पत्तियों को जलाने के कारण बड़े पैमाने पर कथित तौर पर पर्यावरणीय क्षति हुई थी, जिसके बाद इस मामले ने कानूनी रूप ले लिया।
इस घटना पर संज्ञान लेते हुए ट्रिब्यूनल ने देहरादून के प्रभागीय वन अधिकारी को शिकायतों की बारीकी से जांच करने और सभी तथ्यों को सत्यापित करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त और सुधारात्मक कार्रवाई करने के निर्देश भी जारी किए गए थे, ताकि भविष्य में पर्यावरण को इस तरह के नुकसान से बचाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने उत्तराखंड के पीसीसीएफ द्वारा बीती 25 मार्च को जारी किए गए उस आदेश की प्रतियां अदालत के सामने पेश कीं, जिसके तहत वनकर्मियों की ड्यूटी जनगणना कार्य में लगाने की बात कही गई थी। बंसल ने देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के 15 मई 2024 के उस ऐतिहासिक आदेश का विशेष रूप से हवाला दिया, जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग, पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा एक अत्यंत गंभीर विषय है। सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों के संदर्भ में ही अब एनजीटी ने पीसीसीएफ को निर्देशित किया है कि वे कोर्ट के आदेशों की रोशनी में अपनी स्थिति स्पष्ट करें और बताएं कि किस आधार पर वनकर्मियों को इस ड्यूटी पर लगाया गया।
गर्मी के मौसम में गैर-वानिकी कार्यों पर रोक की मांग
याचिकाकर्ता ने अदालत में पुरजोर तरीके से यह बात रखी कि गर्मी के मौसम के दौरान उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी वनों में वनाग्नि यानी जंगलों की आग की घटनाएं चरम पर पहुँच जाती हैं। ऐसे संवेदनशील समय में यदि वन अमले को जनगणना, चुनाव, चारधाम यात्रा या इनके जैसी अन्य प्रशासनिक गतिविधियों में व्यस्त कर दिया जाएगा, तो जंगलों की सुरक्षा रामभरोसे हो जाएगी और फील्ड में जनशक्ति की भारी कमी हो जाएगी।
पर्यावरण और अमूल्य वन्यजीवों की सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए यह मांग की गई है कि वनकर्मियों और वन विभाग के सरकारी वाहनों को किसी भी सूरत में ऐसे गैर-जरूरी कार्यों में न लगाया जाए। एनजीटी ने इस पूरे संकट को गंभीरता से लेते हुए आगामी 26 मई की तारीख मुकर्रर की है, जहां इस पूरे विवाद पर अंतिम फैसला आने की उम्मीद है।

