देहरादून में अस्पताल बना आग का गोला: SOP फाइलों में जलती रही, मरीज धुएं में घुटते रहे,

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देहरादून। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में आग लगने के बाद देशभर में अस्पतालों की फायर सेफ्टी पर सवाल उठे थे। उत्तराखंड सरकार भी तब अचानक अलर्ट मोड में दिखाई दी थी। स्वास्थ्य विभाग ने बैठकों पर बैठकें कीं, तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव आर. राजेश कुमार ने अस्पतालों के लिए बाकायदा SOP तक जारी कर दी। कागजों में सुरक्षा के लंबे-चौड़े दावे किए गए, लेकिन राजधानी देहरादून में जो हुआ उसने उन तमाम दावों की पोल खोल दी। रिस्पना पुल के पास स्थित पैन एशिया अस्पताल में बुधवार को अचानक आग लग गई। शुरुआती जानकारी के मुताबिक आग शॉर्ट सर्किट और एसी ब्लास्ट की वजह से फैली। देखते ही देखते अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। मरीजों और उनके परिजनों में चीख-पुकार शुरू हो गई। धुएं से पूरा परिसर भर गया और अस्पताल प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए।घटना के बाद सबसे दर्दनाक खबर यह रही कि अस्पताल में भर्ती 61 वर्षीय महिला गंभीर रूप से झुलस गई। सिटी मजिस्ट्रेट ने महिला की मौत की पुष्टि भी कर दी। सवाल यह है कि जिस अस्पताल में जिंदगी बचाने का दावा किया जाता है, वही अस्पताल मौत का जाल कैसे बन गया?सूत्रों की मानें तो अस्पताल किसी प्रभावशाली आईएएस अधिकारी से जुड़ा बताया जा रहा है। यही वजह है कि पूरे मामले को बेहद सावधानी से “मैनेज” करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। आग कैसे लगी, फायर सिस्टम काम कर रहा था या नहीं, अस्पताल में आपातकालीन निकासी की व्यवस्था कितनी मजबूत थी—इन तमाम सवालों पर फिलहाल पर्दा डालने की कवायद तेज दिखाई दे रही है।

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विडंबना देखिए, जब हादसा होता है तो पूरा सिस्टम अचानक एक्टिव मोड में नजर आने लगता है। अधिकारी मौके पर दौड़ते हैं, बयान जारी होते हैं, जांच बैठती है और जिम्मेदारी तय करने के दावे किए जाते हैं। लेकिन कुछ दिन बाद वही पुरानी कहानी—“रात गई, बात गई।”

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इस घटना में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। मुख्यमंत्री के सचिव विनय शंकर पांडे खुद मौके पर पहुंच गए, हालात का जायजा लिया, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी नदारद रहे। जिन अफसरों को मौके पर होना चाहिए था, वे छुट्टी का आनंद लेते रहे। इससे साफ है कि विभागीय संवेदनशीलता कितनी “अलर्ट” है।सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग की SOP का हुआ क्या? क्या अस्पतालों में नियमित फायर ऑडिट हुए? क्या इमरजेंसी ड्रिल कराई गई? क्या ICU और वार्डों में फायर अलार्म और स्मोक कंट्रोल सिस्टम चालू हालत में थे? या फिर हर बार की तरह फाइलों में टिक मार्क लगाकर खानापूर्ति कर दी गई?देहरादून के इस हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उत्तराखंड में नियम अक्सर हादसों के बाद ही याद आते हैं। अस्पतालों की चमचमाती इमारतों के पीछे सुरक्षा व्यवस्था कितनी खोखली है, यह पैन एशिया अस्पताल की आग ने उजागर कर दिया। अब देखना यह होगा कि यह मामला भी कुछ दिनों बाद ठंडा पड़ जाएगा या फिर सच में जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी।

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