नई दिल्ली से आई इस आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे कच्चे तेल की कीमतों के चलते भारतीय रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है, जिसे संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा की जा रही भारी दखलअंदाजी भी पूरी तरह बेअसर साबित हो रही है। केंद्रीय बैंक पिछले करीब डेढ़ सप्ताह से अपने विदेशी मुद्रा भंडार से हर दिन लगभग एक अरब डॉलर बाजार में झोंक रहा है, लेकिन इसके बावजूद बुधवार को लगातार नौवें कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज करते हुए रुपया 16 पैसे और टूटकर 96.86 के नए ऐतिहासिक रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ।
कारोबार के दौरान एक समय तो स्थिति इतनी नाजुक हो गई थी कि रुपया फिसलकर 96.95 तक पहुंच गया था, जो कि 97 के मनोवैज्ञानिक स्तर से महज पांच पैसे दूर रह गया था। जानकारों का कहना है कि महंगे क्रूड ऑयल के दबाव के कारण रिजर्व बैंक का यह सुरक्षा चक्र पूरी तरह टूट चुका है और बाजार में डॉलर की मांग व आपूर्ति का संतुलन बिगड़ने से स्थानीय मुद्रा गर्त में जा रही है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की मजबूती बनी मुख्य वजह
आरबीआई के तमाम प्रयासों के असफल होने के पीछे वैश्विक स्तर पर पैदा हुए कुछ कड़े आर्थिक और भू-राजनीतिक समीकरण जिम्मेदार हैं। दरअसल, ईरान संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार 110 डॉलर प्रति बैरल के पास बनी हुई हैं, जिसने देश के आयात बिल को पूरी तरह बेकाबू कर दिया है और केंद्रीय बैंक के डॉलर बेचने के प्रयासों पर पानी फेर दिया है।
इसके साथ ही, अमेरिका में सरकारी बॉन्ड यील्ड 16 महीने के उच्चतम स्तर 4.63 फीसदी पर पहुंच गई है, जिससे वैश्विक बाजारों में यह डर बैठ गया है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में और इजाफा कर सकता है। इस स्थिति के कारण दुनिया भर के बड़े निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश के लिए अमेरिका में ले जा रहे हैं, जिसके चलते भारतीय बाजारों से विदेशी पूंजी लगातार बाहर जा रही है।
आयातकों की बदलती रणनीतियों से बढ़ा असंतुलन
रुपये की इस बेकाबू गिरावट को देखते हुए एबरडीन इन्वेस्टमेंट्स और मेटलाइफ जैसी दुनिया की बड़ी वित्तीय संस्थाओं ने खुले तौर पर यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया है कि रुपये का 100 के स्तर तक पहुंच जाना अब सिर्फ समय की बात रह गया है। इस बीच, रुपये के लगातार गिरते मूल्य को देखकर देश के निर्यातकों ने डॉलर की कमाई को भारत लाने में जानबूझकर देरी करना शुरू कर दिया है ताकि उन्हें भविष्य में और ज्यादा ऊंचे भाव मिल सकें।
दूसरी तरफ, देश के आयातक इस डर के मारे कि आने वाले समय में डॉलर और महंगा हो जाएगा, अपनी भविष्य की जरूरतों के लिए बाजार से आक्रामक तरीके से डॉलर खरीद रहे हैं, जिससे बाजार में पैदा हुए इस दोहरे असंतुलन ने भारतीय मुद्रा पर दबाव को कई गुना ज्यादा बढ़ा दिया है।

