चप्पल उठाने से ‘वरिष्ठ’ बनने तक…अलग राज्य ने बदल दी नेताओं की किस्मत..!

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उत्तर प्रदेश के दौर से राजनीति की गलियों में सक्रिय रहे कई नेता आज उत्तराखंड बनने के बाद अपनी लंबी राजनीतिक पारी और वरिष्ठता का हवाला देकर खुद को सियासत का पुराना खिलाड़ी बताते हैं। लेकिन राजनीति का इतिहास जब थोड़ा पीछे पलटकर देखा जाए तो तस्वीर के कुछ ऐसे पन्ने भी सामने आते हैं, जिन पर आज के ‘बड़े नेताओं’ की पुरानी भूमिका सवाल खड़े करती है।

सत्ता के गलियारों में चर्चाएं तो यहां तक हैं कि अलग राज्य बनने से पहले जिन चेहरों की पहचान बड़े क्षेत्रीय नेताओं के आसपास मंडराने तक सीमित थी, वही आज खुद को राजनीति का स्तंभ बताने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के पुराने सियासी दौर को करीब से देखने वाले जानकार बताते हैं कि उस समय क्षेत्रीय दलों और उनके कद्दावर नेताओं का खासा प्रभाव था।

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उस दौर में राजनीति में जगह बनाने की कोशिश कर रहे कई नेता बड़े नेताओं के इर्द-गिर्द अपनी मौजूदगी दर्ज कराने को ही उपलब्धि मानते थे। राजनीतिक गलियारों में तो पुराने किस्से आज भी चटकारे लेकर सुनाए जाते हैं कि कोई बड़े नेता की चप्पल उठाते दिखाई देता था तो कोई पान का शोंक रखने वाले नेता का पीकदान संभालकर अपनी वफादारी साबित करता दिखाई देता था।

हालांकि इन किस्सों की सच्चाई पर अलग-अलग दावे हो सकते हैं, लेकिन सियासत का इतिहास यही बताता है कि राजनीति में पद और कद हमेशा स्थायी नहीं रहते। वक्त बदलता है, सत्ता का भूगोल बदलता है और फिर राजनीतिक किरदारों की हैसियत भी बदल जाती है।

उत्तराखंड के अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद यही बदलाव कई नेताओं के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर साबित हुआ। जिन चेहरों को कभी बड़े नेताओं की परछाई में देखा जाता था, उन्हें नए राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने का मौका मिला। छोटी सी राजनीतिक पारी देखते-देखते लंबी हो गई और पुराने दौर के ‘अनुयायी’ नए राज्य में ‘वरिष्ठ’ कहलाने लगे।

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यही वजह है कि आज जब कुछ नेता अपने पुराने राजनीतिक अनुभव का हवाला देकर दूसरों को राजनीति का पाठ पढ़ाते हैं तो विरोधी खेमे से सवाल उठते हैं कि आखिर वरिष्ठता का पैमाना क्या है? क्या सिर्फ वर्षों तक राजनीति में बने रहना ही वरिष्ठता है या फिर राजनीतिक संघर्ष, जनाधार और जनता के बीच स्वीकार्यता भी उसका हिस्सा है?

दिलचस्प बात यह है कि सत्ता बदलती रही, सरकारें बदलती रहीं और दल भी बदलते रहे, लेकिन कुछ चेहरे हर दौर में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे। कभी किसी बड़े नेता की छत्रछाया में नजर आने वाले यही चेहरे आज दूसरों को राजनीतिक मर्यादा और सिद्धांतों का ज्ञान देते दिखाई देते हैं।

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सियासत का यही खेल है कल जो चप्पल और पीकदान उठाता था, वह आज कुर्सी पर बैठकर अपने आसपास बैठे लोगों को छोटा समझने लगता है। अलग राज्य ने कई नेताओं को नया राजनीतिक मंच दिया, लेकिन सवाल यही है कि क्या नया मंच पुरानी कहानी भी मिटा देता है? क्योंकि इतिहास मिटाया नहीं जा सकता, उसे सिर्फ कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है। और जब पुराने पन्ने खुलते हैं तो सियासत के कई बड़े किरदारों की ‘बड़प्पन’ की कहानी खुद-ब-खुद छोटी नजर आने लगती है।

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