देहरादून।उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तय की गई अनिवार्य पढ़ाई के दिनों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। मानसून की शुरुआती दस्तक के साथ ही बागेश्वर जिले के स्कूलों में दो दिन की छुट्टी घोषित करनी पड़ी है।
मौसम के बदलते मिजाज और वन्य जीवों के बढ़ते खतरे के कारण पूरे राज्य के स्कूलों में तय मानकों से करीब 20 से 22 दिन कम पढ़ाई हो पा रही है। इस गंभीर स्थिति का सीधा असर उत्तराखंड के प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के लाखों छात्र-छात्राओं की शिक्षा पर पड़ रहा है।
जानिए क्या हैं राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कड़े नियम
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी स्कूलों के लिए एक विशेष पाठ्यचर्या तय की है। इस नियम के अनुसार, बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए प्राइमरी स्तर पर साल में न्यूनतम 200 दिन स्कूल चलना अनिवार्य है।
वहीं दूसरी तरफ, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के छात्रों के लिए सालभर में कम से कम 220 दिन की पढ़ाई को अनिवार्य किया गया है। लेकिन राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते यह आंकड़ा पूरा नहीं हो पा रहा है।
पहाड़ से मैदानों तक भीषण गर्मी की दोहरी मार
उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना के कारण मौसम की मार सबसे पहले स्कूलों पर पड़ती है। पिछले शैक्षणिक सत्र की बात करें, तो अलग-अलग जिलों में सिर्फ बारिश के ‘रेड अलर्ट’ और प्राकृतिक आपदा के चलते ही स्कूलों में 14 से 18 दिनों तक की छुट्टियां घोषित करनी पड़ी थीं।
इसके अलावा, पहाड़ी और वन क्षेत्रों से सटे ग्रामीण इलाकों में हिंसक वन्य जीवों के खतरे को देखते हुए कई बार हफ़्ते भर तक स्कूल बंद रखने पड़ते हैं। वहीं, मैदानी इलाकों के स्कूलों में भीषण गर्मी और लू के चलते अतिरिक्त छुट्टियां देनी पड़ रही हैं।
स्थानीय त्योहारों से भी रुकती है पढ़ाई
मौसम के अलावा स्थानीय आयोजन भी पढ़ाई के दिनों को कम करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। राज्य के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों जैसे हरिद्वार, रुड़की और ऋषिकेश में कांवड़ मेले के दौरान भारी भीड़ को देखते हुए करीब पांच दिन तक स्कूल बंद रखने पड़ते हैं।
इन सभी स्थानीय अवकाशों और आपातकालीन परिस्थितियों को मिलाकर देखा जाए, तो औसतन हर साल 20 दिन स्कूलों में पढ़ाई का सीधा नुकसान दर्ज किया जा रहा है।
3000 एकल शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ
एक तरफ जहां प्रकृति की मार है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक ड्यूटियों ने शिक्षा विभाग का गणित बिगाड़ दिया है। शिक्षकों की जनगणना और SIR में ड्यूटी लगाए जाने के कारण स्कूलों में शिक्षण कार्य बुरी तरह प्रभावित होता है।
यह संकट उत्तराखंड के उन करीब तीन हजार ‘एकल शिक्षक’ वाले स्कूलों में सबसे ज्यादा गंभीर हो जाता है, जहाँ इकलौते शिक्षक के ड्यूटी पर जाने से स्कूल में ताला लटकने की नौबत आ जाती है।
आपातकालीन कोटे का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में
इस बड़ी विडंबना से निपटने के लिए शिक्षा विभाग ने एक विशेष कार्ययोजना तैयार की थी। इसके तहत आपातकालीन छुट्टियों का एक निश्चित कोटा तय करने का प्रस्ताव बनाया गया था, लेकिन शासन स्तर से इस पर अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी।
अब इस कमी की भरपाई के लिए SCERT ने एक वैकल्पिक पहल शुरू की है। इसके तहत स्कूलों की दैनिक समयावधि को थोड़ा बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि दिनों की कमी के बावजूद बच्चों का सिलेबस समय पर पूरा किया जा सके।

