देहरादून। अगर सबकुछ ठीक रहा और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सोच उत्तराखंड की पहाड़ी जमीन पर सलीके से उतरी, तो तय मानिए आने वाले वक्त में पहाड़ से पलायन के पांवों की चाल हमेशा के लिए थम जाएगी। बल्कि पलायन, खुशहाली में बदल जाएगा और राज्य का हर गांव समृद्ध हो जाएगा।
दरअसल, धामी सरकार ने पलायन की जड़ पर वार करने के लिए सबसे सटीक हथियार ढूंढ लिया है-सहकारिता। मुख्यमंत्री धामी नहीं चाहते कि गांवों में बनी किसान सहकारी समितियां सिर्फ उधार देने वाले उदार साहूकार बनकर रह जाएं। धामी की सोच बिल्कुल साफ है – सहकारी समितियां अब गांव की अभिभावक बनेंगी।
सीएम धामी का विजन है कि जिस गांव में जिस काम की संभावना है, उसी काम को सहकारिता का इंजन मिले। सहकारी समितियां सिर्फ पैसा नहीं देगी, बल्कि हौसला भी देगी और बाजार भी। मान लीजिए किसी गांव में होम-स्टे की संभावना है, तो वहां एक-दो लोगों का नहीं, बल्कि पूरे गांव का सहकारी होम-स्टे मॉडल बनेगा।
जहाँ गाड़-गदेरे हैं, वहां मत्स्य सहकारिता संघ और लघु पन-बिजली सहकारिता संघ रोजगार देगा। जहां बागवानी होती है, वहां के काश्तकार अपना सहकारिता ब्रांड बनाकर अपना सेब, कीवी और जूस सीधे बड़े बाजार में बेचेंगे। इसी सोच को जमीन पर उतारने के लिए धामी कैबिनेट ने राज्य की नई सहकारी नीति पर मुहर लगा दी है।
माना जा रहा है कि यह नहीं सहकारी नीति सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि हर गांव के लिए एक इकोनॉमिक मॉडल बनेगी। इस नीति का सीधा मंत्र है – समूहिकता के साथ सहभागिता। गांव का संसाधन, गांव में ही रोजगार पैदा करेगा, गांव में ही ब्रांड बनेगा और मुनाफा भी गांव में ही बंटेगा। तब किसी को सिर्फ रोजगार के लिए अपना घर-गांव नहीं छोड़ना पड़ेगा।
ये तय है कि जिन पहाड़ी गांवों से रोजगार के अभाव में पलायन हुआ है, वहां धामी सरकार का यह सहकारिता मॉडल रामबाण साबित होगा। हालांकि, जिन गांवों से अच्छी शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य के लिए पलायन हुआ है, वहां सरकार को अभी और काम करना होगा, लेकिन नई सहकारी नीति की इस शुरुआत को बेहद शानदार माना जा सकता है।
इसमें दो राय नहीं कि सहकारिता ही पहाड़ के गांवों का कायाकल्प कर सकती है और इस दूरदर्शी सोच के लिए धामी सरकार बेझिझक बधाई की हकदार है।

