Uttarakhand: हाथियों के हमलों से 4 जिले अति संवेदनशील, 3,607 किमी में खतरा

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देहरादून। विश्व हाथी दिवस पर जारी एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि उत्तराखंड के देहरादून, पौड़ी, हरिद्वार और नैनीताल जिले हाथियों के हमलों के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील हैं। राजाजी-कॉर्बेट लैंडस्केप में किए गए सर्वे के अनुसार, राज्य का करीब 3,607 वर्ग किलोमीटर इलाका मानव-हाथी संघर्ष के उच्च जोखिम वाले दायरे में आता है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चारों जिलों के मैदानी और ग्रामीण इलाकों में रहने वाली आबादी की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

अध्ययन के मुताबिक, कम ऊंचाई वाले, समतल और घनी आबादी वाले कृषि क्षेत्रों में इंसानों और हाथियों के बीच सबसे ज्यादा टकराव दर्ज किया गया है। शोधकर्ताओं ने संरक्षित वनों से सटे 266 परिवारों का सीधा सर्वे किया और 25 वर्ग किलोमीटर के 1473 ग्रिड क्षेत्रों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट से साफ हुआ है कि खेतों के पास घर बनाकर रहने वाले और विभिन्न फसलों की खेती करने वाले ग्रामीण हाथियों के सीधे निशाने पर आ रहे हैं।

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शोध में सामने आया है कि कृषि भूमि के निकट रहने वाले लोगों के लिए खतरा सबसे अधिक रहता है, जबकि जंगलों से दूरी बढ़ने पर यह जोखिम घटने लगता है। वहीं, भौगोलिक ऊंचाई और पहाड़ी ढलान वाले इलाकों में हाथियों के हमले की संभावना काफी कम पाई गई है। हैरान करने वाली बात यह भी है कि घने सड़क नेटवर्क वाले क्षेत्रों में भी संघर्ष की घटनाएं अपेक्षा से काफी कम दर्ज की गई हैं।

यह महत्वपूर्ण शोध एमिटी यूनिवर्सिटी और दक्षिण कोरिया की सियोल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड वन विभाग के सहयोग से पूरा किया है, जो प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘फॉर नेचर कंजर्वेशन’ में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में दक्षिणी देहरादून, राजाजी का श्यामपुर, रसियाबड़ और मोतीचूर क्षेत्र, हरिद्वार का बिढ़ियापुर व झिलमिल झील इलाका, पौड़ी का लैंसडौन वन प्रभाग और नैनीताल का कॉर्बेट टाइगर रिजर्व मुख्य खतरे वाले जोन के रूप में चिन्हित किए गए हैं।

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उत्तराखंड में मानव-हाथी संघर्ष किस कदर भयानक रूप ले चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 वर्षों में हाथियों के हमले से करीब 300 लोगों की जान जा चुकी है। अकेले इस साल अब तक 6 लोग हाथियों का शिकार बन चुके हैं। दूसरी तरफ, बिजली का करंट लगने, ट्रेन-सड़क दुर्घटनाओं और शिकार के कारण 300 से ज्यादा हाथियों की भी दर्दनाक मौत हुई है।

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इसके अलावा, राज्य में हाथियों की सटीक संख्या को लेकर भी पेंच फंसा हुआ है। पिछले साल भारतीय वन्यजीव संस्थान की गणना में राज्य में 1792 हाथी बताए गए थे, जिसे उत्तराखंड वन विभाग ने गलत करार देते हुए खारिज कर दिया था। वन विभाग अब हाथियों की सही गिनती के लिए नए सिरे से दोबारा गणना कराने की तैयारी में जुटा है।

ओमप्रकाश सती की इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार, राजाजी और कॉर्बेट के प्राकृतिक रास्तों में इंसानी दखल और फसलों के बदलाव से हाथियों का व्यवहार तेजी से बदल रहा है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की यह रिपोर्ट उत्तराखंड सरकार और वन विभाग के लिए ग्राउंड लेवल पर ठोस सुरक्षा नीति बनाने में बेहद मददगार साबित होगी।

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