सत्ता और सिस्टम की गलियों में कुर्सी का अपना ही गणित होता है। कुर्सी मिल जाए तो काम मनमाफिक कराने की चाहत बढ़ती है और जब सामने वाला नेता उम्मीद के मुताबिक साथ न दे, तो कहानी सियासत से निकलकर चर्चाओं के ऐसे गलियारों तक पहुंच जाती है, जहां तर्क पीछे और रहस्य आगे दिखाई देने लगता है। शहर में इन दिनों एक अधिकारी और नेता से जुड़ा ऐसा ही किस्सा चर्चाओं का विषय बना हुआ है, जिसमें बात कथित तौर पर ‘काले जादू’ तक पहुंच गई है।
शहर की राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि एक अधिकारी की किसी नेता से पटरी नहीं बैठी। नेता ने अधिकारी की हर बात पर हामी भरने के बजाय अपने हिसाब से फैसले लेने शुरू किए तो दोनों के बीच दूरी बढ़ती चली गई। इसके बाद जो कहानी चर्चाओं में आई, उसने लोगों को भी हैरान कर दिया। कहा जा रहा है कि इसी खींचतान के बीच नेता की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। पहले सामान्य परेशानी समझी गई, लेकिन जब स्वास्थ्य में लगातार गिरावट की चर्चाएं सामने आईं तो तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। किसी ने इसे तनाव बताया तो किसी ने डिप्रेशन की बात कही। कुछ लोगों ने तो नशे तक से जोड़कर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन अब चर्चाओं का नया एंगल यह है कि बीमारी के पीछे किसी कथित तांत्रिक क्रिया या ‘काले जादू’ का हाथ होने की बात कही जा रही है। हालांकि इन चर्चाओं की कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है बावजूद इसके शहर में कहानी इतनी तेजी से घूम रही है कि अधिकारी से लेकर नेता तक हर कोई अपने-अपने हिसाब से इसकी व्याख्या कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सत्ता और प्रशासन के रिश्तों में बात यहां तक पहुंचने की नौबत क्यों आई? क्या यह महज राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान है या फिर इसके पीछे कोई ऐसी कहानी है, जिसे सामने आने से रोकने की कोशिश की जा रही है?
शहर में यह भी चर्चा है कि कई बार अधिकारी अपनी कुर्सी बचाने या मनमाफिक फैसले कराने के लिए राजनीतिक गलियारों में प्रभाव तलाशते हैं। जब बात नहीं बनती तो दबाव, सिफारिश और दूसरे हथकंडों का सहारा लेने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन अगर ‘काले जादू’ वाली चर्चा में जरा भी सच्चाई है, तो मामला सामान्य प्रशासनिक टकराव से कहीं आगे का हो जाता है। फिलहाल पूरा मामला चर्चाओं, कयासों और दावों तक सीमित है। न किसी कथित तांत्रिक गतिविधि का प्रमाण सामने आया है और न ही अधिकारी पर लगे इस बेहद गंभीर आरोप की पुष्टि हुई है। लेकिन शहर की चाय की दुकानों से लेकर सियासी अड्डों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—कुर्सी के लिए सियासत और प्रशासन की लड़ाई क्या अब तंत्र-मंत्र की कहानियों तक पहुंच गई है? यही सवाल इस पूरे किस्से को फिलहाल शहर की सबसे रहस्यमयी चर्चाओं में शामिल किए हुए है।

